क्या हिंदुत्व की राजनीति में पिछड़ गई है भाजपा?
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क्या हिंदुत्व की राजनीति में पिछड़ गई है भाजपा?

Author: Neeraj Jha calender  16 Nov 2018

क्या हिंदुत्व की राजनीति में पिछड़ गई है भाजपा?

इलाहाबाद, प्रयागराज हो गया। फैज़ाबाद - अयोध्या। लखनऊ के लक्ष्मणपुरी होने की बात चल रही है और आगरा के अग्रवन या अग्रवाल। इन नामों के बदलने से और कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आएगा  - यह नाम बदलने वालों को भी पता है। फिर भी बदले जा रहे हैं नाम। क्या है नाम बदलने के पीछे की सियासत?

क्या कहते हैं मार्कण्डेय काटजू?

पिछले चार पाँच महीने में आदित्यनाथ ने जो नया नामकरण किया है, वह गुड़गाँव-गुरुग्राम, बैंगलौर-बेंगलुरु और बंबई-मुंबई के समकक्ष नहीं रखा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीश मार्कण्डेय काटजू ने अपने ट्विटर अकाउंट पर 30 शहरों की सूची पोस्ट की। सूची में शहरों के नाम के आगे उन्हें जिन नामों से विस्थापित किया जा सकता है, वह लिखा है। काटजू की ये सूची नाम परिवर्तन के पीछे की सियासत को समझाती है। कुछ नाम और सुझाया हुआ नया नाम नीचे लिख रहा हूँ - 

अहमदाबाद - अष्टावक्रनगर

हमीरपुर - हरेकृष्णनगर

बुलंदशहर - बजरंगबलिपुर

गाजीपुर - गणेशपुर 

अष्टावक्रनगर के ज़रिए शायद नाम परिवर्तन की मंशा पर तंज कस रहे हैं काटजू और अगले नामों में साफ तौर पर दिख रहा है कि मुस्लिम इतिहास को समेटे शहरों के नाम जो मुस्लिमों से मंसूब होते हैं, उन्हें हिंदु नामों से विस्थापित किया जा रहा है।

क्या है नाम परिवर्तन के पीछे की सियासत?

हिंदुओं को यह बताने की कोशिश की जा रही है कि भैया आज़ादी के बाद ये पहली सरकार आई है जो तुम्हारी भावनाओं की कद्र करती है। ये अलग बात है - कि आक्सीजन की कमी से बच्चों के मरने के बाद की भावनाओं का कोई मोल नहीं। ये अलग बात है कि - स्थायी होने के लिए भूखे-प्यासे शिक्षकों की हड़ताल में लाठियाँ भाँजते हुए उनकी भावनाओं का कोई मोल नहीं। ये अलग बात है कि एनकाउंटर के नाम पर किसी को भी मार देने के बाद उसके पीछे बचे परिवार और आश्रितों की भावनाओं का कोई मोल नहीं।

जनता फिर से परेशान - किसे और क्यों चुने?

2019 के चुनाव मुहाने पर खड़े हैं। जनता ऊहापोह की स्थिति में है। कांग्रेस या संपूर्ण विपक्ष लोगों में विश्वास पैदा नहीं कर पा रही। मोदी मैजिक के सहारे बेजोड़ बहुमत के साथ सत्ता में पहुँची बीजेपी का रंग भी फीका पड़ चुका है। कांग्रेस, बीजेपी को आगे कर के वोट माँग रही है और बीजेपी नेहरु को।

बीजेपी की नैया फिर से राम सहारे

विकास, नौकरी, महिला सुक्षा, किसानों की आया आदि मामलों को बीजेपी सामने लायी तो खुद ही फँस जाएगी। इसके अलावा, बीजेपी की राजनीतिक आधार राम और राममंदिर की चर्चा भी बीजेपी को बैकफुट पर ही लाएगी।अगर हिंदुओं की आस्था को सच में केवल आस्था का विषय रहने दिया जाए तो बीजेपी के सियासत की रीढ़ टूट जाएगी। 

  1. प्रदेश और केंद्र दोनों जगहों पर सत्ता में होने के बावज़ूद बीजेपी राममंदिर के सपनों को पूरा नहीं कर पाई।।
  2. गौरक्षा का ढ़ोल आलाप कर हिंदुओं का ध्रुवीकरण करने वाली बीजेपी राज में बीफ एक्सपोर्ट अपने चरम पर पहुँचा।
  3. सवर्ण वोटबैंक के आधार वाली बीजेपी से एससी-एसटी एक्ट के कारण सवर्ण वोटबैंक छोड़ा नाराज़ चल रहा है।

बीजेपी वाले राम अब भी बयानों की नींव और नारों के कंगूरों वाले राजमहल में विराज रहे हैं। ऐसे में, राम के नाम पर जो वोटर बीजेपी से जुड़े थे, उनके भी पृथक होने की संभावना बढ़ रही थी। और सामान्य राजनैतिक जानकारी वाले व्यक्ति को भी इस बात का पता है कि बीजेपी के वोटर्स का सबसे बड़ा तबका यही वाला है। 

राममंदिर की जगह हिंदुवादी अास्थाओं का लॉलीपॉप

ऐसे में, दोबारा सत्ता में आने के लिए इनको साधा जाना बीजेपी के लिए बहुत ज़रूरी हो गया था। अपने हिंदुओं को राममंदिर नहीं दे पाई, तो उनकी आस्थाओं के नामपट्ट लगवाने की कोशिश कर रही है। बिल्कुल वैसे ही, जैसे बच्चे चॉकलेट का वादा करके लवनचूस पकड़ा दिया गया हो।

बीजेपी भी इस बात को जानती है कि न तो अयोध्या नाम रख देने से फैजाबाद की दरिद्रता दूर हो जाएगी, और न ही इलाहाबाद को प्रयागराज कर देने से संगम में कोई दैवीय शक्ति आ जाएगी। इन नामों को बदल देने से देश के इतिहास को नहीं बदला जा सकता। वह इतिहास जो मुगलों की सल्तनत और उनकी व्यवस्थाओं की बात करती है। वह इतिहास जो आक्रांताओं के सुल्तान और सुल्तानों के रंक बन जाने की कहानी बयान करती है। वह इतिहास जो हिंदुओं से मुगलों, मुगलों से ब्रिटिशर्स औऱ फिर लोकतांत्रिक भारत के सफर को दिखाता है।

फिर भी नाम बदले जा रहे हैं। इसे लेकर चर्चाएँ हो रही हैं। टीवी डिबेट 6-7 सदियों पहले की घटनाओं के इर्द-गिर्द घूम रही हैं। हिंदुओं और मुस्लिमों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करने के लिए इलाहाबाद को प्रयागराज के खिलाफ और अयोध्या को फैज़ाबाद के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है। और बाँटने का यह खेल धार्मिक आस्था के मैदान पर खेला जा रहा है। न तो आस्थाओं से न ही भावनाओं से इन नाम परिवर्तनों का कुछ लेना-देना है।

चुनाव मुहाने पर खड़े हैं। विकास फेल साबित हो रहा है। सारे नारों की कलई खुल चुकी है। मोदी-मैजिक या मोदी लहर खत्म हो चुका है। और राम राजनैतिक बनवास ही झेल रहे हैं। तब मोदी सरकार के पास हिंदु वोटबैंक को मूर्ख बनाने के अलावा और कोई उपाय बचा नहीं है। यह नाम परिवर्तन मूर्ख बनाने का तरीका मात्र है और कुछ नहीं।

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