दस साल तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह इतने सन्नाटे में क्यों हैं?

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दस साल तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह इतने सन्नाटे में क्यों हैं?

दस साल तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह इतने सन्नाटे में क्यों हैं?

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बात साल 1993 की है. मध्य प्रदेश का तब विभाजन नहीं हुआ था. विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो कांग्रेस ने भाजपा से सत्ता छीन ली थी. 320 सीटों वाले तत्कालीन मध्य प्रदेश में कांग्रेस को 174 सीटों पर सफलता मिली थी. यह वह दौर था जब प्रदेश कांग्रेस में दिग्गजों की भरमार थी, ऐसे दिग्गज जिनका मध्य प्रदेश में ही नहीं बल्कि केंद्रीय राजनीति में भी दख़ल होने के साथ पार्टी के आला नेतृत्व से उनकी नज़दीकियां थीं.

पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह, श्यामाचरण शुक्ल, माधवराव सिंधिया, सुभाष यादव, विद्याचरण शुक्ल, मोतीलाल वोरा जैसे बड़े नाम तब प्रदेश कांग्रेस में मौजूद थे. लेकिन जब बहुमत प्राप्त कांग्रेस के सामने अपने विधायक दल का नेता यानी मुख्यमंत्री के चयन का सवाल आया तो उपरोक्त सभी दिग्गजों में से अधिकांश की महत्वाकांक्षाएं वह पद पाने की थीं. लेकिन, तब इन सभी नामों को पीछे छोड़कर जिस चेहरे पर मुख्यमंत्री की मुहर लगी, वह थे- दिग्विजय सिंह. वे तब पार्टी की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष थे.

‘राजनीतिनामा- मध्य प्रदेश’ पुस्तक के लेखक वरिष्ठ पत्रकार दीपक तिवारी बताते हैं, ‘उस समय श्यामाचरण शुक्ल का भी नाम मुख्यमंत्री बनने की दौर में था. वहीं, अर्जुन सिंह सुभाष यादव को मुख्यमंत्री बनाए जाने के पक्ष में थे. लेकिन, दिग्विजय सिंह ने तब सीधा तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के साथ जोड़-तोड़ कर ली थी और कमलनाथ भी दिग्विजय सिंह के साथ आ गए.

वे आगे कहते हैं, ‘वहीं, एक वर्ग था जो माधवराव सिंधिया को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहता था. उस समय विद्याचरण शुक्ल भी प्रदेश के बड़े नेता थे, उनका भी एक अपना गुट था जो श्यामाचरण के साथ तो नहीं था लेकिन दिग्विजय का विरोधी था. पार्टी में ही बहुत से गुट हुआ करते थे, उन सभी चुनौतियों से पार पाकर दिग्विजय मुख्यमंत्री बने थे.’ एक बार दिग्विजय मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे तो 10 सालों तक वहां जमे रहे.

बकौल दीपक तिवारी, ‘1993-98 का उनका पहला कार्यकाल इन सभी बड़े नामों और पार्टी के अंदर ही अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से जूझने में बीता. लेकिन जब 1998 के चुनावों में फिर से कांग्रेस उनके नेतृत्व में जीती तो प्रदेश और पार्टी में उनका कद बढ़ गया. वर्ष 2000 आते-आते प्रदेश विभाजन के बाद शुक्ला बंधु और मोतीलाल वोरा छत्तीसगढ़ निकल गए. माधवराव सिंधिया का निधन हो गया. इस बीच, अर्जुन सिंह ने भी अपना नया राजनीतिक दल बना लिया था. तो कुल मिलाकर दिग्विजय प्रदेश के एकमात्र बड़े चेहरे थे जो कांग्रेस में बचे रह गए.’

इसलिए राजनीतिक उठापटक के वही माहिर खिलाड़ी दिग्विजय सिंह आज जब कैमरे के सामने कहते नज़र आते हैं, ‘मैं चुनावों में इसलिए प्रचार नहीं करता क्योंकि मेरे प्रचार करने से पार्टी के वोट कटते हैं’, तो सवाल उठता है कि क्या एक वक़्त राजनीति के चाणक्य, वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के राजनीतिक गुरु कहे जाने वाले दिग्विजय अब पार्टी में वास्तव में हाशिये पर धकेले जा चुके हैं?

क्या भाजपा के मार्गदर्शक मंडल के नेताओं की तरह ही वे भी बस नाममात्र के लिए कांग्रेस में रह गए हैं?

अगर ऐसा है तो अपनी चपलता और राजनीतिक समझ से बड़े-बड़े दिग्गजों को पछाड़कर मुख्यमंत्री बनने वाले दिग्विजय आख़िर क्यों अब पार्टी में इन हालातों में पहुंच गए हैं? और ऐसी उनकी क्या विवशता है कि हाशिये पर धकेले जाने के अपमान के बाद भी वे पार्टी की गतिविधियों में बढ़-चढ़कर शामिल होने के लिए उतावले दिखाई देते हैं?

वर्ष 2003 के विधानसभा चुनावों में जब मध्य प्रदेश में दिग्विजय के नेतृत्व में कांग्रेस की हार हुई और वह 230 सीटों वाली विधानसभा में केवल 38 सीटों पर सिमट गई तो दिग्विजय सिंह ने ऐलान किया कि वे अगले एक दशक तक कोई चुनाव नहीं लड़ेंगे और न ही प्रदेश की राजनीति में दख़ल करेंगे.

वे ‘द वायर’ के साथ बातचीत में ख़ुद कहते हैं, ‘2003 में मुझ पर आरोप लगा था कि दिग्विजय सिंह की वजह से कांग्रेस चुनाव में हार गई. इसलिए मैंने कहा कि ठीक है, अब आप लोग जिताइए.’ 10 साल की यह प्रतिज्ञा लेने के बाद दिग्विजय कांग्रेस की केंद्रीय संगठन की राजनीति में सक्रिय हो गए. 2008 में वे अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (एआईसीसी) के महासचिव बनाए गए. इस दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश, असम, बिहार, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में पार्टी की नीतियां बनाईं.

उन्हें मीडिया में राहुल गांधी के राजनीतिक गुरु के तौर पर भी पेश किया जाने लगा. तब राहुल गांधी की सभाओं में वे अक्सर उनके करीब ही नज़र आते थे. कांग्रेस ने भी उन पर ख़ूब भरोसा दिखाया और गोवा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश व तेलंगाना जैसे राज्यों का उन्हें प्रभार सौंपा जहां कांग्रेस की सरकार बनाने के लिए उन्हें स्थानीय नेतृत्व के साथ नीतियां बनानी थीं. 2013 में उनका स्वघोषित 10 साल का वनवास ख़त्म हुआ तो उन्होंने कहा कि पार्टी अगर उन्हें लोकसभा के चुनाव में उतारना चाहेगी तो वे उतरेंगे. हालांकि, उन्हें तब लोकसभा का टिकट नहीं मिला था लेकिन 2014 में पार्टी ने उन्हें राज्यसभा का टिकट ज़रूर दे दिया था.

इस बीच, दिग्विजय सिंह अपने बयानों को लेकर हमेशा सुर्ख़ियों में छाए रहते थे, फिर चाहे वह बाटला हाउस मुठभेड़ पर उनके द्वारा सवाल उठाना रहा हो, अमेरिका द्वारा आतंकी ओसामा बिन लादेन का शव समुद्र में फेंकने पर आपत्ति जताना हो या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर उनका हमलावर रुख़ हो.

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के दौर में एक वक़्त ऐसा भी था जब दिग्विजय सिंह की बयानबाज़ी के संबंध में कहा जाता था कि दिग्विजय कांग्रेस के ऐसे हथियार हैं जिसे पार्टी चारों ओर से घिरने पर चलाती है और उनका एक विवादित बयान हर मुद्दे से देश का ध्यान भटका देता है.

बहरहाल, पार्टी में दिग्विजय के बुरे दौर की शुरुआत तब हुई जब 2017 में गोवा प्रभारी के तौर पर वे गोवा में कांग्रेस की सरकार बनवाने में ऐसे वक़्त में असफल हुए जब चुनावी नतीजों में कांग्रेस को भाजपा से अधिक सीटें मिली थीं. नतीजतन कुछ ही समय बाद उनसे गोवा के साथ-साथ चुनावी मुहाने पर खड़े कर्नाटक राज्य का प्रभार भी वापस ले लिया गया. दो माह बाद उनकी तेलंगाना के प्रभारी के तौर पर भी छुट्टी कर दी गई.

अब वे केवल राज्यसभा सांसद रहे और पार्टी में उनके पास आंध्र प्रदेश का प्रभार बचा था और पार्टी महासचिव थे. लेकिन, 2018 में केंद्रीय राजनीति में दिग्विजय की भूमिका तब पूरी तरह से ख़त्म हो गई जब उन्हें पार्टी के नवनिर्वाचित अध्यक्ष राहुल गांधी की एआईसीसी में महासचिव के पद से हटा दिया गया और आंध्र प्रदेश का भी प्रभार ले लिया गया. केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ओमान चंडी को यह दोनों ज़िम्मेदारियां सौंप दी गईं.

कांग्रेस को लगी गोवा की चोट के बाद धीरे-धीरे पार्टी ने पूरी तरह से दिग्विजय से किनारा कर लिया. वर्तमान में वे केवल मध्य प्रदेश कांग्रेस समन्वय समिति के अध्यक्ष हैं. जहां उन्हें पार्टी की ओर से पार्टी की प्रदेश इकाई में व्याप्त गुटबाज़ी से निपटने का काम सौंपा गया है.

हालांकि, समन्वय समिति के अध्यक्ष के तौर पर उनकी नियुक्ति भी विवादित रही. ऊपरी तौर पर यह समिति गुटबाज़ी समाप्त करने की कांग्रेस की एक कवायद है लेकिन सत्यता यह है कि यह दिग्विजय को साधने की एक कोशिश मात्र थी. गुटबाज़ी दूर करने के लिए बनाई गई यह समिति स्वयं गुटबाज़ी की ही देन थी.

वाकया यूं था कि नर्मदा परिक्रमा यात्रा समाप्त करने के बाद दिग्विजय सिंह ने घोषणा की कि वे हर विधानसभा क्षेत्र में जाएंगे और कार्यकर्ताओं एवं नेताओं को एकजुट कर आगामी चुनाव के लिए पार्टी को तैयार करेंगे. उनका कहना था कि प्रदेश के नेताओं में इस हद तक गुटबाज़ी है कि कोई किसी की नहीं सुनता.

इस बीच कांग्रेस का एक अंदरूनी सर्वे मीडिया में सामने आया जिसमें कहा गया कि दिग्विजय का जनता के बीच जाना कांग्रेस को नुकसानदेह हो सकता है और कांग्रेस ने उन्हें यात्रा पर जाने से रोक दिया. इस दौरान कमलनाथ की ताजपोशी भी बतौर अध्यक्ष हो गई. उन्होंने 12 मई को निर्देश जारी किए कि बिना पार्टी की अनुमति कोई भी यात्रा नहीं निकाली जाएगी. फिर अचानक 22 मई को पार्टी ने दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता में समन्वय समिति का गठन करके दिग्विजय को वही काम आधिकारिक तौर पर सौंप दिया जो कि वे पहले निजी यात्रा के माध्यम से करना चाहते थे. लेकिन यहां भी उनके पर काटने में कोई कमी नहीं रखी.

निजी समन्वय यात्रा में पहले जहां दिग्विजय हर विधानसभा का दौरा करना चाहते थे लेकिन कांग्रेस की औपचारिक समन्वय यात्रा में उन्हें ज़िला स्तर पर ज़िम्मेदारी सौंपी गई. साथ ही पार्टी में उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी सत्यव्रत चतुर्वेदी को भी समिति का सदस्य नियुक्त कर दिया. विशेषज्ञ मानते हैं कि यात्रा से रोके जाने के बाद दिग्विजय की नाराज़गी दूर करने के लिए केवल उन्हें सांत्वना देने हेतु उनकी अध्यक्षता में समन्वय समिति बनाई गई.

राजनीतिक विशेषज्ञ गिरिजा शंकर कहते हैं, ‘यदि चुनाव के ठीक पहले किसी राजनेता को उसकी पार्टी चार-छह महीने की निजी यात्रा (नर्मदा यात्रा) करने के लिए छुट्टी देती है तभी साफ हो जाता है कि उस नेता के होने न होने से पार्टी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है. इसलिए दिग्विजय के मामले में पार्टी ने सितंबर 2017 में ही संकेत दे दिया था कि वे जो करना चाहें करें, अब पार्टी को उनकी ज़रूरत नहीं है.’

नर्मदा यात्रा की बात करें तो दिग्विजय सिंह 30 सिंतबर 2017 को नर्मदा परिक्रमा यात्रा पर निकले थे. इसे उन्होंने अपनी निजी धार्मिक यात्रा क़रार दिया था. लगभग छह माह चली यह यात्रा प्रदेश में नर्मदा नदी से लगी 90 विधानसभा सीटों से होकर गुज़री थी.

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