राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बयान ‘हिंदू भावनाओं को समझकर न्याय’ के क्या हैं मायने
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बयान ‘हिंदू भावनाओं को समझकर न्याय’ के क्या हैं मायने

BBC Hindi   03 Nov 2018

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बयान ‘हिंदू भावनाओं को समझकर न्याय’ के क्या हैं मायने

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस के सरकार्यवाह (जनरल सेक्रेटरी) सुरेश जोशी ने कहा है कि 'अपेक्षा है' कि राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट 'हिंदू भावनाओं को समझकर न्याय देगा.'

हिंदुत्व विचारधारा की शीर्ष संस्था के नंबर-दो सुरेश भैय्याजी जोशी ने ये भी कहा कि अयोध्या केस में सुप्रीम कोर्ट के रुख़ से हिंदू समाज में अपमान की भावना महसूस की जा रही है और करोड़ों लोगों की संवेदनाओं से जुड़े मामले की सुनवाई को मुल्तवी करने के फ़ैसले पर अदालत को पुनर्विचार करना चाहिए.

राम मंदिर और हिंदू भावनाओं का घालमेल आरएसएस की पुरानी नीति रही है, लेकिन अदालत पर 'हिंदू संवेदनाओं की क़द्र' की बात उछालने पर जानकारों का कहना है कि अगर बात भावना की है तो 'ये काम उस दल को करना चाहिए था जिसने राम के नाम पर वोट बटोरे थे.'

उत्तर में अयोध्या, दक्षिण में बरीमला

संघ के हालिया बयान, राज्य सभा के एक मनोनीत सदस्य राकेश सिन्हा का राम मंदिर निर्माण पर प्राइवेट मेम्बर बिल लाने का वादा और कुछ दूसरे हिंदुत्ववादी संगठनों के अयोध्या मामले से जुड़े कार्यक्रमों का ज़िक्र करते हुए राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी कहती हैं कि ये हिंदुओं में उस भावना को जगाने की रणनीति का हिस्सा है कि राम मंदिर निर्माण में बाधा डाली जा रही है.

नीरजा कहती हैं, "इसमें केरल के सबरीमला मंदिर मामले को जोड़ दें, तो पूरी रणनीति साफ़ हो जाएगी.- उत्तर भारत में राम मंदिर और दक्षिण में सबरीमला".

विश्व हिंदू परिषद यानी विहिप ने सबरीमला को दक्षिण का अयोध्या बताया है.

विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने कहा, "सबरीमला मंदिर की पवित्रता और उसकी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यता हैं, उसकी आस्था और विश्वास पर जिस तरह से हमले हो रहे हैं उसने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की मानसिकता को साफ़ कर दिया है.

केरल में सीपीएम और आरएसएस का झगड़ा दशकों पुराना है और दोनों तरफ़ से हुई हिंसा में बहुत सारे कार्यकर्ता अपनी जान गंवा चुके हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर में एक सुनवाई करते हुए केरल के सबरीमला मंदिर में 10 से 50 साल की औरतों के प्रवेश पर लगी रोक को ये कहते हुए ख़त्म कर दिया था कि ये समानता के अधिकार के ख़िलाफ़ है.

केरल के अयप्पा स्वामी के सबरीमला मंदिर में प्रवेश की ये परंपरा 10 से 50 साल की महिलाओं के पीरियड्स के मद्देनज़र की गई थी.

फ़िलहाल केरल में एक वर्ग इसका पुरज़ोर विरोध कर रहा है और ये इतना हिंसक हो चला है कि सीपीएम के जनरल सेक्रेटरी सीताराम येचुरी ने अपने एक बयान में इसकी तुलना 1990 के दशक के राम मंदिर आंदोलन से की थी.

सीताराम येचुरी ने आरोप लगाया था कि सबरीमला में भी अयोध्या जैसी हरकतें हो रही हैं और इसके पीछे आरएसएस का हाथ है.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी इस दौरान केरल की यात्रा कर चुके हैं और उन्होंने बयान दिया है कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसे फ़ैसले नहीं करने चाहिए जिसका वो पालन नहीं करवा सकती है.

अमित शाह के इस बयान को कई लोगों ने ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बताया था और कहा था कि केंद्र सरकार में मौजूद पार्टी के नेता का ऐसा कहना 'अशोभनीय' है.

शुक्रवार को महाराष्ट्र के भयंडर में सुरेश जोशी ने जहां राम मंदिर पर सवालों के जवाब दिए वहां सबरीमला पर भी उनका बयान आया. उन्होंने कहा, "कोई भी समाज मात्र अधिकारों पर नहीं बल्कि परंपराओं और मान्यताओं पर चलता है. सभी मंदिरों में महिलाओं को समान प्रवेश मिले, लेकिन जहां कुछ मंदिरों की विशिष्ट परंपराओं का प्रश्न है इसमें उन मंदिरों की व्यवस्था से जुड़े लोगों से चर्चा किए बग़ैर कोई निर्णय लिया जाता है तो ये उचित नहीं है."

भैय्याजी के नाम से जाने जाने वाले सुरेश जोशी ने ये भी कहा कि ऐसे निर्णय देते वक़्त न्यायालय को इन विषयों से जुड़े सभी पक्षों को एकमत करने का प्रयास करना चाहिए.

जानकार कहते हैं लोगों के बीच सामंजस्य पैदा करना अदालत का काम नहीं, ये ज़िम्मेदारी सामाजिक संगठनों और राजनीतिक नेतृत्व की है जिसमें आरएसएस जो ख़ुद को एक सामाजिक संगठन बनाता है और बीजेपी जो एक राजनीतिक दल है, उसकी ज़िम्मेदारी ज़्यादा है.

राम मंदिर-बाबरी मस्जिद दीवानी मुक़दमे (टाइटिल सूट) पर फ़ैसला देते वक़्त हिंदू भावनाओं की क़द्र के मामले पर नीरजा चौधरी का कहना है, "अदालती फ़ैसले साक्ष्यों और संवैधानिक आधार पर दिए जाते हैं न कि भावनाओं को ध्यान में रखकर, अगर बात जज़्बात के क़द्र की है तो भारतीय जनता पार्टी चार साल से सरकार में है उसे इस मामले पर क़ानून लाना चाहिए था."

अखिल भारतीय हिंदू महासभा के राष्ट्रीय सचिव मुन्ना कुमार शर्मा सवाल करते हैं, "अगर राम मंदिर अदालत के फ़ैसले से ही बनना है तो हम ही बनवा लेंगे, जो इस केस को दशकों तक लड़ते आए हैं, फिर लोग बीजेपी को वोट क्यों दें?"

राम मंदिर-बाबरी मस्जिद दीवानी मुक़दमे में हिंदू महासभा एक मुद्दई है, दूसरे दो हैं: निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड.

मुन्ना कुमार शर्मा कहते हैं, "बीजेपी ने राम के नाम पर वोट बटोरे हैं तो सवाल है कि जब वो चार साल से सत्ता में रहे तो आख़िर इस पर क़ानून क्यों नहीं लाया, जो अब बात प्राइवेट मेम्बर बिल की हो रही है."

29 अक्तूबर को तीन दिनों की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक शुरू होने से पहले जारी एक प्रेस रिलीज़ में आरएसएस ने कहा, संघ का मत है कि जन्मभूमि पर भव्य मंदिर शीघ्र बनना चाहिए और जन्म स्थान पर मंदिर निर्माण के लिए भूमि मिलनी चाहिए.

शुक्रवार सुबह में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और संघ के दूसरे नेताओं और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के बीच भयंडर में एक मुलाक़ात हुई.

हालांकि उस बाबत सवाल पूछे जाने पर भैय्याजी जोशी ने इस मामले पर कुछ कहने से इनकार कर दिया.

स्वराज इंडिया के प्रमुख योगेंद्र यादव ने अपने एक लेख में कहा है, "अगर सबका साथ सबका विकास के नारे पर सत्ता में आई सरकार की अग्नि परीक्षा विकास नहीं, राम मंदिर के सवाल पर होती है, तो सिर्फ़ बीजेपी ही नहीं, पूरा देश ही रामभरोसे है."

बीजेपी और संघ की राजनीति पर नज़र रखनेवाले वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कौशल सवाल के लहजे में कहते हैं, "बीजेपी सरकार को चार साल हो चुके हैं और वो पूर्ण बहुमत की सरकार है."

राकेश सिन्हा के प्राइवेट मेम्बर बिल पर टिपण्णी करते हुए प्रदीप कौशल कहते हैं कि राम मंदिर निर्माण पर अगर कोई क़ानून लाना है तो पार्टी को सीधे तौर पर लाना होगा उसमें प्राइवेट मेम्बर बिल का सवाल कहां पैदा होता है.

लेकिन इस पूरे मामले पर चर्चा किस तरह से फैलाने की कोशिश हो रही है उसका अंदाज़ा राकेश सिन्हा के ट्वीट्स से मिलता है जिसमें उन्होंने राहुल गांधी से लेकर सीताराम येचुरी और अखिलेश यादव तक को टैग कर सवाल पूछा है कि वो राम मंदिर पर उनके बिल का समर्थन करेंगे या नहीं?

प्रदीप कौशल कहते हैं कि ऐसा बहुत ही कम हुआ है कि कोई प्राइवेट मेम्बर बिल चर्चा से आगे बढ़ पाया हो.

इस बीच, अक्टूबर में दिल्ली में विश्व हिंदू परिषद मुख्यालय में संत उच्चाधिकार समिति की बैठक के बाद राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण को लेकर एक व्यापक कार्यक्रम तैयार हुआ जिसका दूसरा फ़ेज़ दीवाली के बाद शुरू होगा जिसमें संगठन से जुड़े लोग अपने-अपने इलाक़ो में जनसभाएं कर स्थानीय सांसदों से मुलाक़ात करेंगे और मंदिर पर सहमित बनाने की कोशिश करेंगे.

वीएचपी ने दिसंबर में भारत भर में प्रत्येक घर और फिर सार्वजनिक तौर पर इस मामले पर पूजा और अनुष्ठानों की योजना बनाई है.

लगभग संघ के विचार को दोहराते हुए विनोद बंसल कहते हैं कि मंदिर की अदालती कार्यवाही में लंबा समय बीत गया है और इस मामले पर जब एक समय प्रगति होती दिखी थी तो कांग्रेस से जुड़े वकीलों ने सब गड़बड़ कर दिया.

साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई शुरू हुई थी तो सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल और अन्य ने इसकी सुनवाई 2019 के बाद करवाने की मांग की थी ताकि आम चुनाव ख़त्म हो जाएं.

हाल में इसकी सुनवाई 29 अक्तूबर को शुरू होनी थी लेकिन अदालत में इसके लिए अगली तारीख़ दे दी है.

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