"एम जे अकबर के केबिन में जाते हुए मैं हज़ार बार मर जाती थी"
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"एम जे अकबर के केबिन में जाते हुए मैं हज़ार बार मर जाती थी"

Author: Neeraj Jha  12 Oct 2018

"एम जे अकबर के केबिन में जाते हुए मैं हज़ार बार मर जाती थी"

"एम जे अकबर के केबिन में जाते हुए मैं हज़ार बार मर जाती थी।" - दुर्गा के नौ रूपों की पूजा करते हुए यह वाक्य सभी को अपने ज़ेहन में रखना चाहिए। उन महिलाओं के बारे में सोचना चाहिए जिनके जिस्म से होते हुए उनकी रूह तक पर निशान छोड़ दिए हैं समाज की खोखली मर्दानगी ने। #MeToo अभियान के तहत विदेश राज्य मंत्री समेत नामी-गिरामी लोगों के पूर्व के काम उन्हें बदनाम कर रहे है। पाँच महिलाओं ने उन पर यौन उत्पीड़न का इल्ज़ाम लगाया है। लोग इसमें भी कांग्रेस, बीजेपी कर रहे हैं। चलिए, मान लेते हैं कि नैतिकता की दृष्टि से बीजेपी को अब तक एक्शन ले लेना चाहिए था। लेकिन गाँधी का प्रयोग और गोड्से की पूजा करने वाली विचारधारा को मानने वाली पार्टी से नैतिक कदमों की अपेक्षा मूर्खता है।

मीडियकर्मियों, साहित्यकारों और कलाकारों पर लग रहे हैं इल्ज़ाम

ध्यान देने वाली बात ये है कि जिस वक्त के इल्ज़ाम अकबर पर लगे हैं, वो उस वक्त संपादक थे। पत्रकार थे। एकमात्र अकबर नहीं, बल्कि बड़े बड़े मीडिया संस्थानों के नामी गिरामी संपादक, सर्वाधिक सेलीब्रेटेड ऑथर्स में से एक चेतन भगत, मशहूर फिल्म निर्देशक विकास बहल, शीर्ष अभिनेता नाना पाटेकर, फिल्मी पर्दे पर नैतिकता के नमूने आलोक नाथ इस #MeToo कैंपेन के कारण नंगे हो गए हैं। हालाँकि इन मामलों की जाँच भी होनी चाहिए। अगर इन लोगों को नंगा करने की नाजायज कोशिश की गई है, तो कोशिश करने वालों को किसी भेद के बिना सज़ा मिलनी चाहिए। अगर ये सच में नंगे हैं तो इनके बचे-खुचे चीथड़े भी उधड़ जाने चाहिए।

देवियों की पूजा अपने पाप का प्रायश्चित प्रयास

#MeToo कैंपेन के मामले में समाज दो धड़ों में बँटता दिख रहा है। वाजिब भी है। किसी के भी आरोपों को यूँ ही नहीं मान लेना चाहिए। कई महिलाएं जिन व्हाट्सएप चैट का स्क्रीनशॉट पोस्ट कर रही हैं, उस चैट के पूरे वाक़ये और सिचुएशन को समझना ज़रूरी है। लेकिन इन सबके बीच एक बात से इंकार नहीं किया जा सकता, वो ये कि महिलाओं का अस्तित्व हमारे समाज में महज़ एक शरीर के अलावा और कुछ नहीं।

एक शरीर जिसे अपनी यौनेच्छाओं के लिए पुरुष जैसे मर्ज़ी वैसे प्रयोग कर सकता है। और इस सबमें महिलाओं की सहमति का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। महिलाओं को इस समाज ने स्तनों के आकारों, कूल्हों, नख-शिख, बनावट, कद-काठी में बाँट दिया है। और इस हकीकत से खुद पुरुषवर्ग भी अनभिज्ञ नहीं है। समाज में होने वाली देवियों की पूजा अपने इसी पाप का एक प्रायश्चित प्रयास भर है।

महिलाओं को लेकर मीडिया में है फेवरिटज्‍म?

मीडिया हाउस में काम कर रहे लोग इस बात से कतई इंकार नहीं कर सकते कि संस्थानों में महिलाओं को लेकर एक अलग तरह का पक्षपात है। इसमें कोई दोराय नहीं है कि महिलाओं के लिए यह पक्षपात उनकी भलाई के लिए नहीं। कुछ सालों पहले एक महिला रिपोर्टर का सुसाइड पहले भी मीडिया संस्थानों में लैंगिक अत्याचारों की कलई खोल चुका है। नए लड़के जो एंकर बनने का सपना पाल रहे होते हैं, उनकी राह में सबसे बड़ी दुश्वारियों में से एक है उनका लड़की न होना। हर संस्थान और हर व्यक्ति की कहानी ये नहीं है, लेकिन ज्यादातर की किताबें इन्हीं अफ़सानों से भरी है। 

एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के लिए भी बुरा ख़्वाब साबित हुआ है #MeToo कैंपेन

मीडिया के अलावा यह #MeToo कैंपेन एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के लिए भी बुरा ख़्वाब साबित हो रहा है। नाना पाटेकर, आलोक नाथ, चेतन भगत और बहल के नामों ने इस इंडस्ट्री को भी शर्मसार किया है। वैसे इस इंडस्ट्री के लिए शर्मसार ज्यादा बड़ा शब्द है। कास्टिंग काउच की कहानियाँ, महिला कलाकारों के साथ सेक्सुअल ज्यदतियों के किस्से इस इंडस्ट्री के साथ हमेशा से जुड़े रहे हैं।  

दोनों पक्षों की बात सुनी जानी ज़रूरी

क्या सही है और क्या गलत - इसे जानने-समझने के लिए कोई रॉकेट साइंस नहीं लगाना। बस थोड़ा सा खुला दिमाग, थोड़ी  नैतिक समझ और थोड़ा धीरज चाहिए। न तो लोगों को यह कहकर बचना चाहिए कि ताली तो दोनों हाथों से ही बजती है और न ही यह कहकर कि यह पितृसत्तात्मक समाज हमेशा महिलाओं के साथ ज़्यादती करता है। धीरज के साथ दोनों पक्षों की बात सुनी जानी चाहिए। दोनों को बराबर का दोषी या बराबर का निर्दोष मानते हुए। केवल तभी इस मामले में सत्य के पक्ष तक पहुँचा जा सकेगा।

#MeToo - अब तक की अक्षमता का प्रतीक

ये घटनाएँ न हों, इसके लिए इस आवाज़ को और मुख़र होना पड़ेगा। पद और ओहदों से डरकर बैठ जाने से ये दुराचार बढ़ेंगे ही। घटेंगे नहीं। #MeToo कैंपेन अब तक की अक्षमता के साथ अब मिली ताकत का भी प्रतीक है। बस ऐसा न हो कि यह कैंपेन भी कुछ चटपटी स्टोरीज़ के साथ खत्म हो जाए। #MeToo कहने की नौबत ही न आए, यह ज्यादा ज़रूरी है। 

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