किसानों के दर्द की दास्तान

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किसानों के दर्द की दास्तान

किसानों के दर्द की दास्तान

Author: Neeraj Jha

अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा पर्व पर जय जवान और जय किसान के नारों के बीच जवान और किसान एक दूसरे के खिलाफ हिंसा में शामिल थे। एक तरफ गाँधी जी और शास्त्री जी को श्रद्धांजलि दी जा रही थी जबकि दूसरी तरफ उनके आदर्शों और उनकी विचारधारा की हत्या हो रही थी।

किसान होना सम्मान से बन गया अभिशाप

टमाटर की कीमतें 100 रुपए को पार करें तो राष्ट्रीय हेडलाइन बनता है लेकिन क्या कभी उसी टमाटर को एक रुपए जैसे कम कीमत तक बेचने वाले किसान की चर्चा आपने राष्ट्रीय मीडिया में सुनी? क्या आपने कभी सोचा है - कि क्यों हममें से ज्यादातर के आँखों ने किसान बनने का ख़्वाब नहीं देखा। क्यो एक किसान अपने बच्चे को अपना पेट काट काट कर पढ़ाता लिखाता है ताकि उसे किसानी न करनी पड़े। क्यों किसान होना सम्मान की बात नहीं बल्कि अभिशाप बन गया है। जब 5 साल में 12000 से अधिक किसान आत्महत्या कर लें, सरकार कृषि में निवेश कम कर दे, किसानों को किताबों, मेनीफेस्टो और चुनावी वादों में कैद कर के रख दिया जाए तो कोई क्यों अपने ही पैर पर कु्ल्हाड़ी मारेगा, कोई क्यों किसानी करेगा।

MSP के नाम पर किसानों के साथ धोख़ा

चार महीने पहले MSP का ढ़ोल पीटकर अपना पीठ थपथपाने वाली सरकार ने किसानों के साथ बड़ा धोखा किया है। MSP निर्धारण के तीन तरीके होते हैं 

A2 - बीज, खाद, पानी और बिजली के खर्चे के आधार पर MSP का निर्धारण

A2+FL - A2 में शामिल खर्चों के अतिरिक्त लेबर कोस्ट शामिल करने के बाद कुल खर्चे के आधार पर MSP का निर्धारण

A2+FL+Land Cost - C2 - A2+FL में शामिल खर्चों के अतिरिक्त ज़मीन की कीमतों को शामिल करने के बाद कुल खर्चे के आधार पर MSP का निर्धारण

क्या है स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिश

स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिशों के मुताबिक किसानों को C2 के आधार पर MSP दिया जाए। लेकिन सरकार ने इसकी घोषणा A2+FL के आधार पर की। इस बारे में नीति आयोग के चेयरमैन ने कहा कि ज़मीन की औसत कीमत निकालना मुश्किल काम है, इसलिए MSP के निर्धारण के लिए लैंड कोस्ट को शामिल नहीं किया गया। मतलब, सरकार औसत कीमत या एक ऐसा तरीक़ा जिससे ज़मीन की कीमत को MSP के निर्धारण में शामिल किया जाए निकालने में असफल रही है। और सरकार की इस असफलता की कीमत किसान चुका रहे हैं।

चुनावों के बाद किसान हो जाते हैं चर्चाओं से बाहर

जब 2014 में भारतीय जनता पार्टी ने कहा - सबका साथ-सबका विकास तो किसानों को लगा कि शायद इस सब में वे भी हैं। जब आज के पीएम मोदी समेत तमाम दिग्गजों ने कहा कि किसानों की आय दोगुनी कर दी जाएगी तो किसानों को लगा कि कोई मसीहा आ गया है जो अन्नदाताओं को उनका सम्मान और प्रतिफल मिलेगा। लेकिन हर चुनावी वादे की तरह ये वादे भी ज़मीन पर नहीं उतरे। सबका साथ सबका विकास में किसानों को शामिल नहीं किया गया। 

बढ़ रहा है किसानों का आक्रोश

किसानों के आक्रोश के कारण शुरू हुए किसान आंदोलनों के आँकड़े उपर लिखी बातों का सबूत हैं। NCB के मुताबिक़ सन 2014 में 628 किसान विद्रोह हुए थे जो 2015 में बढ़कर 2683 और 2016 में 4837 हुए। 2017 में मध्य प्रदेश के किसानों का आंदोलन हो, महाराष्ट्र के किसानों का सड़कों पर दूध उड़ेलकर विरोध का प्रदर्शन हो या तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के किसानों द्वारा अपनी फसल जलाकर, उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों का सीएम को पत्र लिखकर आत्महत्या की अनुमति मांगकर विरोध का प्रदर्शन हो या बारिश के प्रकोप से ग्रस्त तमिलनाडु के किसानों का 41 दिन लंबा प्रदर्शन, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार हर राज्य में किसान व्यथित है। और जब वह अपनी व्यथा को सरकार के सामने रखता है तो बदले में उसे मिलती है लाठियाँ, आँसू गैस, डंडे और वॉटर कैनन। जो किसान देश के लिए अन्न उपजाता है उसे कहा जाता है पाकिस्तानी। 

जायज़ माँगों के लिए लड़ रहे हैं किसान

किसान कमोबेश एक-से माँग को लेकर ही विरोध करते हैं। उन मांगो में शामिल है - स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिशें लागू करना, कृषि कर्ज़ को माफ़ करना, उचित एमएमपी का निर्धारण करना, फसलों का इंश्योरेंस, प्राकृतिक आपदाओं के वक्त सरकार से सहायता, स्टोरेज और विपणन का उचित प्रबंध और बिचौलियों से मुक्ति। इनमें से कौन सी माँग नाजायज। आज भी देश के ज्यादातर किसान पैसों के लिए निजी उधारदाताओं पर निर्भर रहते हैं और फिर ताउम्र उनके चंगुल में फँसे रहते हैं। देश में मंडियाँ कम हैं। हर किसान मंडियों तक सामान ले नहीं जा पाता और बिचौलियों का शिकार हो जाता है। ये बिचौलिये घून की तरह किसानों के आय को खाते रहते हैं। 2015 में शांता कुमार ने एक रिपोर्ट पेश की जिसमें उन्होंने बताया कि केवल 6 पर्सेंट किसानों को वाक़ई एम एस पी मिल पाता है। सहायता सरकार से नहीं माँगेगे तो कहाँ जाएँ?

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