गाँधी और आत्मिक आज़ादी की ज़रूरत
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गाँधी और आत्मिक आज़ादी की ज़रूरत

Author: Neeraj Jha  02 Oct 2018

गाँधी और आत्मिक आज़ादी की ज़रूरत

स्वतंत्रता संघर्ष के शुरुआती दिनों में महात्मा गाँधी कहते थे - वे महज़ राजनैतिक आज़ादी के लिए नहीं लड़ रहे। उनका मुख्य मकसद आत्मिक आज़ादी है। लोगों के मन से डर समाप्त करना है। संघर्ष के दौरान उन्होंने काफी हद तक इस लीक को पकड़े भी रखा और सफल भी हुए। उन्होंने लोगों के मन से जेल का डर खत्म कर दिया। जिसके कारण लगभग पूरा देश अंग्रेज़ों के खिलाफ एकजुट हो गया।

क्यों है गाँधी और आत्मिक आज़ादी की ज़रूरत

आज जब हम राजनैतिक रूप से आज़ाद हैं, आत्मिक आज़ादी का विषय फिर से प्रासंगिक हो गया है। लोग इऩडिपेंडेंट होने की जगह किसी विचारधआरा, किसी व्यक्ति तो किसी राजनैतिक पार्टी पर डिपेंडेंट हो गए हैं। कहीं पेरियार की टूटी हुई मूर्ति तो कहीं गाँधी का उजड़ा हुआ स्मारक, कहीं राजनैतिक विचारधाराओं की लड़ाई में हुई हत्याएँ तो कहीं छिटपुट घरेलु मामलों में पिस्तौल का निकल जाना, कहीं कांग्रेस मुक्त भारत का नारा तो कहीं RSS भगाओ देश बचाओ का - दिल मानने को तैयार नहीं होता कि इसी धरती पर कभी मोहनदास कर्मचंद गाँधी पैदा हुए थे। 

असहिष्णुता - बढ़ता हुआ दंश

पश्चिम बंगाल और केरल में पॉलीटिकल किलिंग्स, उत्तर प्रदेश में पुलिस एनकाउंटर के नाम पर चल रही गुण्डागर्दी, राजस्थान मे जातिगत हिंसाएँ, जम्मु-कश्मीर में क्षेत्रीय लोगों और सेना के बीच की झड़पें, तेलंगाना के ऑनर किलिंग्स, पूरे देश में महिलाओं के खिलाफ हो रहा अत्याचार, पूरे देश में फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद के नाम पर जारी पागलपन - ये सब असहिष्णुता के उदाहरण हैं। 

महात्मा गाँधी होते, तो एंटी नेश्नल कहलाते

विविध विचारधाराओं का सम्मान तो छोड़िए, आज के भारत में विविध विचारधाराओं के अस्तित्व पर भी ख़तरा मँडरा रहा है। अलग मतों को स्वीकार करने का न तो किसी में साहस बचा है न हीं इच्छा। आज सही वही है, जो हम मानते हैं, की फिलॉसफी सभी के दिलो दिमाग पर हावी है। इसी कारण से एक नया शब्द प्रचलन में आ गया है - एंटी नेश्नल। वो हर व्यक्ति जो सरकार की राय से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता, एंटी नेश्नल घोषित किया जा रहा है। संभव है महात्मा गाँधी होते, तो एंटी नेश्नल कहलाते।

महात्मा के सिद्धांतों से भटकता हुआ देश

महात्मा गाँधी के सिद्धांत क्लासरूम, सेमीनार, कांफ्रेंस, भाषण आदि तक सिमट गये हैं। गाँधी की तस्वीर के नीचे हिंसा और नफ़रत को बढ़ावा देने वाली बातों को प्रचारित किया जाता है। उदारवाद के हिमायती गाँधी के देश में अतिवाद ने पैर पसार लिए हैं। 

असहाय है आज की राजनीति

कैपिटल पनिशमेंट के विरोध में खड़ा होने वाला देश मॉब लिंचिंग में नंबर एक पर है। महात्मा कहते थे कि आँख के बदले आँख पूरे विश्व को अंधा बनाकर छोड़ेगा। लेकिन आज भीड़तंत्र, लोकतंत्र पर हावी हो गई है। और राजनीति इसके सामने असहाय दिखती है।

आलोचनाओं की जगह नहीं

महात्मा अपने पूरे जीवनकाल में तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत का विरोध करते रहे। गरमपंथियों और क्रांतिकारियों की आलोचनाएँ झेली भी। लेकिन आज वैकल्पिक विमर्श रखने वालों को सबक सिखाने का प्रचलन है। आलोचकों को सरकारी तंत्र में शामिल लोग अपना दुश्मन समझते हैं।

देश में विखंडन ज़ोरों पर

लगभग हर राजनैतिक दल ने लोगों को बाँटने का काम किया है। देश की आब-ओ-हवा ज़हरीली हो चली है। साँस लेते हुए भी नफ़रत का ज़हर हमारे अंदर जा रहा है। मौतें, बलात्कारें, गुण्डई, हिंसाएं सब हिंदु और मुसलमान हो गई हैं। यहाँ लोग नहीं मरते, हिंदु और मुसलमान मरा करते हैं। यहाँ महिलाओं का बलात्कार नहीं होता, हिंदुओं और मुस्लिमों का होता है। 

संप्रदाय, जाति और राजनैतिक विचारधाराओं के चश्मे ने इंसान को अंधा बना दिया है। गाँधी केवल नोटों तक बचे रह गए हैं और गाँधी के सिद्धांत धूल में अटी ज़िल्द वाली किताबों तक। ज़रूरी है इन किताबों को खोला जाए, गाँधी को समझा जाए और समझाया जाए। गाँधी आज की ज़रूरत हैं।

 

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