आधार हो गया निराधार - सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
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आधार हो गया निराधार - सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

Author: Neeraj Jha   26 Sep 2018

आधार हो गया निराधार - सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

धार कार्ड वाले गुब्बारे की हवा निकल चुकी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मिली सशर्त वैधता के शर-शैय्या पर बैठा आधार कार्ड आख़िरी साँसे गिन रहा है। 10 साल तक जिस बैंक में पैसा जमा करवाए, पता चला ऊ बैंके भाग गया - रांझणा फिल्म का ये संवाद बीजेपी सरकार पर सटीक बैठ रही है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऐसा लगता है मानो आधार कार्ड से कह रहा हो आपको मारेंगे ज़रूर पर शहीद नहीं होने देंगे। 

आधार से लड़ाई का सफर

आधार की वैधता की लड़ाई UPA-2 में ही शुरू हो चुकी थी। लेकिन इस लड़ाई ने गति पकड़ी 2015 में जब सुप्रीम कोर्ट ने कुछ सरकारी योजनाओं में आधार की सहमति दी। लेकिन साथ ही यह भी कहा कि आधार का प्रयोग अंतिम निर्णय आने तक स्वैच्छिक रहेगा। इसी मुकदमे के दौरान सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल ने निजता के अधिकार से इंकार किया। नतीजा - आधार की लड़ाई निजता के अधिकार की लड़ाई बन गई।

अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि निजता का अधिकार भारत के नागरिक का मूलभूत अधिकार है। और इसके बाद जनवरी 2018 में शुरू हुई आधार कार्ड की वैधता की लड़ाई।

सुप्रीम कोर्ट की दूसरी सबसे लंबी कार्यवाही

38 दिनों की कार्यवाही और पाँच महीनों की अवधि के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आधार की वैधता पर निर्णय दिया है। इस निर्णय में यों तो हर कोई अपने हिस्से की ख़ुशी ढ़ूँढ़ सकता है, लेकिन वास्तव में सरकार का आधार बेकार साबित हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आधार पूरी तरह से वैध है।

फैसला देते हुए जस्टिस एके सीकरी ने कहा कि ये जरूरी नहीं है कि हर चीज अच्छी हो, कुछ अलग भी होना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि आधार कार्ड गरीबों की ताकत का जरिया बना है, इसमें डुप्लीकेसी की संभावना नहीं है। लेकिन इसके बावज़ूद आधार की आनिवार्यता को लगभग हर जगह से समाप्त कर दिया गया है। फैसला पढ़कर कहा जा सकता है कि आधार वैध ज़रूर है लेकिन पहचान का आख़िरी पत्र नहीं।

आधार और विवाद शुरुआत से ही रहे साथ साथ

आधार कार्ड बीजेपी का ड्रीम प्रोजेक्ट कहा जा सकता है। पूरे देश की एक पहचान बनाने की कवायद मे बीजेपी लगी हुई थी। लेकिन शुरुआत से ही आधार विवादों के जाल में फँसा रहा। निजी डाटा की सुरक्षा चिंता की सबसे बड़ी वज़ह थी। समय-समय पर आधार डाटा लीक के प्रमाण भी मिलते रहे। आधार कार्ड की सबसे बड़ी किरकिरी तब हुई जब UIDAI के पूर्व डाइरेक्टर जनरल ने इस पूर्णतया सुरक्षित बताते हुए अपना आधार नंबर सार्वजनिक कर दिया और बदले में लोगों ने उनकी निजी डिटेल्स इंटरनेट पर उड़ेल दीं।

आधार बन गया था जी का जंजाल

आधार पिछले दिनों की सबसे बड़ी खीझ बनकर उभरा। आधार का दबाव बिल्कुल वैसा था जैसे कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वाले लोगों के उपर रिपोर्टिंग का दबाव होता है। बैंक में अकाउंट खुलवाना है तो आधार, सिम फोन खरीदना है तो आधार, होटल में कमरा चाहिए या पर्यटन क्षेत्रों में घूमने फिरने के लिए यातायात सुविधाएँ, सरकार दफ़्तर में काम काज हों या निजी कार्यालय में - आधार का जाल हर तरफ फैल गया था। 

देश कहीं सर्विलांस स्टेट न बन जाए

यहाँ तक कि निजी स्कूल्स, कॉलेज और विश्वविद्यालयों में भी आधार को अनिवार्य कर दिया गया था। माहौल था कि आधार के बिना देश में आदमी बेकार हो गया था। अपने अस्तित्व की पुख़्तगी के लिए लोगों ने हल्के-भारी मन से आधार को अपना भी लिया लेकिन इसके बाद डाटा लीक की ख़बरों ने नींद उड़ा दी। लोग सोचने लगे कि कहीं यह पूरे देश के लोगों को सरकार द्वारा अपनी निगरानी में रखने का एक माध्यम तो नहीं। 

आधार से वार

इन सवालों को विपक्षी पार्टियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उठाया। याचिकाकर्ताओँ ने याचिका दायर की और माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपना निर्णय दिया। आधार कार्ड के पंखों को कतर दिया गया। पैन लिंकिंग के लिए आधार ज़रूरी है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित जगहों से आधार की अनिवार्यता ख़त्म कर दी - 

  • बैंक अकाउँट खुलवाते वक्त
  • स्कूल, कॉलेज में दाख़िला लेते हुए
  • निजी/सरकारी कंपनियों से किसी तरह की सेवाएँ लेते हुए
  • सिम कार्ड खरीदते हुए

इसके अलावा - 

  • ऑथेंटिकेशन डाटा सिर्फ 6 महीने तक रखा जा सकता है
  • आधार अधिनियम की धारा 57 रद्द - निजी कंपनिया नहीं मांग पाएंगी आधार डेटा

सरकार जिस आधार पर लगभग पाँच सालों तक लड़ती रही, उसे हार गई। सरकारों को पागलपन या जुनून की हदों को छोड़कर दूरदर्शिता से काम करना चाहिए। पहले एक हर्फ़ लिखें और फिर उस मिटाएँ में ज्यादा समय खर्च करना वाजिब नहीं है। 

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