क्या समलैंगिक संबंधों का महिमामंडन उचित?
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क्या समलैंगिक संबंधों का महिमामंडन उचित?

Author: Neeraj Jha calender  10 Sep 2018

क्या समलैंगिक संबंधों का महिमामंडन उचित?

सहमति से बनाए गए अप्राकृतिक यौन संबंध अब अपराधों की श्रेणी में नहीं रखे जाएंगे। धारा 377 को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला भारतीय सामाजिक ढ़ाचे में आमूलचूक परिवर्तन लाएगा। यह स्वागत योग्य फैसला है। लेकिन हम सभी को समीक्षा करनी चाहिए कि क्या यह फैसला समलैंगिक यौन संबंधो को महिमामंडित करता है? क्या इस फैसले के आधार पर समलैंगिक यौन संबंधों को येन-केन-प्रकारेण सही सिद्ध करना उचित है? दूसरा पहलु यह भी है कि क्या समलैंगिकों को मात्र कानूनी संरक्षण की ज़रूरत है?

क्या समलैंगिक संबंधों का महिमामंडन उचित?

कानून की नज़र में किसी प्रवृत्ति का अपराध न होना इंसानी संवेदनाओं, कमियों और हार्मोनल बीमारियों को कानूनी संरक्षण प्रदान करना है। ताकि अपने चुने हुए यौन संबंधों को लेकर किसी को आजीवन या अवधि विशेष के लिए कारावास न हो। बिल्कुल उसी तरह जैसे किसी व्यक्ति का मल खाना अपराध नहीं है लेकिन घृणित है। इसको प्रमोट नहीं किया जा सकता। लेकिन इसके आधार पर किसी को सज़ा भी नहीं दी जा सकती। यौन संबंध निजी मसअला है। लेकिन निजी स्तर पर भी हर व्यक्ति को श्रेष्ठता हासिल करने के प्रयास करने चाहिए।

क्या है धारा 377

इंडियन पीनल कोर्ट की धारा 377 के अनुसार पुरुष, महिला या पशु के साथ किसी भी तरह का आप्राकृतिक यौन संबंध एक आपराधिक कृत्य माना जाता था। और इस मामले में दोषी पाए जाने वाले को आजीवन कारावास, किसी सीमित अवधि के लिए कारावास या कुछ ज़ुर्माना लगाया जाता था। 

धारा 377 का इतिहास

1861 के ब्रिटिश भारत में अस्तित्व में आए इस एक्ट को 157 सालों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया। 2009 से इस एक्ट के खिलाफ चर्चाएँ तेज हो गई थी। दिल्ली हाइकोर्ट ने 2009 में इस केस के कछ अंशों को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त किया था। 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बदल दिया। कोर्ट ने फैसला देते हुए कहा कि धारा 377 के बारे में कोई भी फैसला संसद ले न कि न्यायपालिका। 

किसने किया धारा 377 का समर्थन?

गृहमंत्री राजनाथ सिंह, उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ, समाजवादी पार्टी के रामगोपाल यादव ने एक कंठ से धारा 377 का समर्थन किया। इन्होंने कहा कि किसी भी तरह का अप्राकृतिक यौन संबंध भारतीय संस्कृति के साथ मेल नहीं खाता।

किसने किया धारा 377 का विरोध?

जबकि वर्तमान वित्त मंत्री अरुण जेतली, आम आदमी पार्टी संयोजक अरविद केजरीवाल इस धारा का विरोध कर रहे थे। इनके अलावा कम्यूनिस्ट पार्टी, जदयू, टीएमसी और कांग्रेस के नेताओं ने भी धारा 377 का विरोध किया। इनका मानना था कि धारा 377 लोगों केनिजी अधिकारों पर हमला है। सहमति से बनाए गए यौन संबंध वाजिब होने चाहिए। 

क्या है कोर्ट का ताजा फैसला?

6 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही पूर्व के फैसले से विपरीत दिशा में जाते हुए समलैंगिकता को डि-क्रिमिनिलाइज़  कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान प्रदत्त मूलभूत अधिकार समलैंगिक यौन संबंधो की रक्षा करता है। और सहमति से बनाए गए संबंधो को अपराध करार देना असंवैधानिक कदम होगा। यह दिन भारतीय सामाजिक विकास की गति में अविस्मरणीय रहेगा। बहरहाल सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए। यह फैसला हज़ारों की संख्या में मौजूद उन लोगों के लिए आज़ादी के अनुभव जैसा है जो अपने पसंद से यौन संबंध बनाने के कारण अपराधी हो जाते थे।

कैसे होगा सुप्रीम कोर्ट का आदेश पूरा?

नैसर्गिक चाहतों से इतर चाह रखने वाले लोग समानता चाहते हैं। सम्मान और आदर चाहते हैं। आम लोगों की तरह जीना चाहते हैं। बिल्कुल उसी तरह, जैसे अलग अलग जातियों, भाषाओं और क्षेत्रों के लोग समान अवसर, समान सम्मान की आशा करते हैं। इस फैसले के बाद काफी लोगों ने इस कदम का स्वागत किया। लेकिन बहुत बड़े तबके ने कटाक्ष भी किया। समलैंगिकों को लेकर तरह-तरह के मीम बनाए और फैलाए गए। किसी भी समुदाय के लोगों को संख्याबल में अधिक होने वाले समुदाय के लोगों द्वारा अलग विचारधारा, रिवाज़ों, शौक़ के कारण निरादर के भाव से देखना ग़लत है। उनको सामाजिक स्तर पर पृथक करके देखने से सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश कभी पूरा नहीं हो सकता। 

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