युवाओं को मंदिर नहीं रोज़गार चाहिए
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युवाओं को मंदिर नहीं रोज़गार चाहिए

Author: Neeraj Jha calender  13 Aug 2018

युवाओं को मंदिर नहीं रोज़गार चाहिए

15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से पीएम मोदी देश को संबोधित करेंगे। पिछले चार सालों से अधिक के अपने कार्यकाल में पीएम ने लोगों के साथ कई बार बातचीत की लेकिन प्रवाह एकतरफा रहा। मोदी अपने मन की बात उनके साथ करते रहे। एक सर्वे के ज़रिए लोगों ने बताया वे मोदी से किस बारे में सुनना चाहते हैं। दरअसल प्रश्न था कि आप स्वतंत्रता दिवस के मोदी के भाषण में किस बारे में सुनना चाहेंगे? 52.63 फ़ीसदी लोगों ने कहा रोज़गार के बारे में, 18.42 फ़ीसदी लोग महिलाओं के विरुद्ध अपराध के बारे में सुनना चाहते थे, 17.47 फ़ीसदी लोग हिंदु-मुस्लिम एकता जबकि 11 फ़ीसदी लोग भारत-पाक संबंध के बारे में मोदी के भाषण में सुनना चाहते थे। ये दिखाता है कि रोज़गार के मामले में लोगों के दिलों में एक बेचैनी है।

बेरोज़गारी के कारण बढ़ रहे हैं अपराध!

खाली दिमाग शैतान का घर होता है। बहुत पुरानी कहावत है, लेकिन पूरी तरह प्रासंगिक है। अपने चारों ओर के माहौल पर गौर करने से इसकी प्रसंगिकता को अनुभव किया जा सकता है। देश में अपराध पिछले सालों में लगातार बढ़े हैं। हेट क्राइम्स नाम शब्द शब्दावली में जुड़ गया है और दुर्भाग्यपूर्ण प्रगति कर रहा है। चोरी चकारी में तकनीक शामिल होते जा रहे हैं। साइबर क्राइम का बोलबाला हो गया। बंदूक की नोंक से लाखों करोड़ो का डाका डालने का रिवाज़ कम हो रहा है और घर बैठे फोन या कंप्यूटर के ज़रिए लोगों को चपत लगाई जा रही है। जानते हैं क्यों? क्योंकि लोग खाली हैं। अच्छे पढ़े-लिखों से लेकर, गरीब लाचार लोग खाली बैठे हुए हैं। नौकरी है नहीं कि दिमाग या शरीर की कुछ कसरत करें। ज़रूरतें ख़त्म होती नहीं बल्कि अपने पेस से बढ़े जाती हैं। सो उन ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कुछ न कुछ तो करेंगे ही। ये चोरी, डकैती, साइबर क्राइम उसी खालीपन का नतीज़ा है। 

नारों और भाषणों से बढ़कर ज़मीन पर रोज़गार के आँकड़े ज़ीरो

देश में सरकारें जब भी आती हैं तो रोज़गार की बात ज़ोर-शोर से होती है। लेकिन बातों से आगे बढ़कर क्रियान्वयन के स्तर तक पहुँच नहीं पाती। युवाओं का महिमामंडन और युवाशक्ति की प्रशंसा मंचों, नारों और भाषणों से इतर कही दिखता नहीं। देश की लगभग हर पार्टी युवाओं को भटकाने का काम करती है। क्योंकि यह आयुवर्ग सबसे ज्यदा वल्नरेबल होता है। ज़रूरतमंद होते हैं युवा, सपने देखने की ताकत होती है उनमें और इसी ताकत का नाजायज फ़ायदा उठाते हैं राजनीतिज्ञ। सपनों के मायाजाल में युवाओं को उलझा लिया जाता है। 

रोज़गार के वायदे को पूरा करने में हर पार्टी नाकाम

2009 में कांग्रेस ने हर परिवार में कम से कम एक सदस्य को रोज़गार दिलाने का वादा किया था। वादे की हक़ीकत बिल्कुल ही अलग है। सन 2014 में बीजेपी और मोदी ने भी युवाओं को ऐसा ही सपना दिखाया था। हर वर्ष 2 करोड़ रोज़गार। लेकिन रोज़गार जैसा कहीं कुछ दिखता नहीं। भारत विश्व में सबसे ज्यादा बेरोज़गारों वाला देश बन गया है। देश की 65 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या युवा है। यह देस की ताकत होनी चाहिए। लेकिन बेरोज़गारी के कारण ये युवा सबसे बड़ी कमज़ोरी बन गए हैं। दूसरा पहलु यह दर्शाता है कि हमारा अर्थव्यवस्था दुनिया भर में तीव्रतम गति से बढ़ रही है। अर्थव्यवस्था के बढ़ने और बेरोज़गारी के बीच का संबंध जानना जटिल नहीं है। दरअसल देश की लगभग 58 फ़ीसदी संपत्ति पर 57 लोगों का कब्ज़ा है। अमीरों और गरीबों के बीच का आर्थिक और सामाजिक फ़ासला लगातार बढ़ रहा है। य़ह असमानता अपराधों को जन्म दे रही है।

रोज़गार सृजन के मामले में Skill India सफ़ेद हाथी

सरकार ने 2014 में Ministry for Skill Development and Entrepreneurship की स्थापना की। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना शुरु की गई। लेकिन दूरदर्शिता के अभाव के कारण अपेक्षित परिणाम नहीं निकल पाया। स्किल डिवेलपमेंट के नाम पर युवाओं को जो सिखाया जा रहा था, वह इंडस्ट्री की ज़रूरतों से मेल नहीं का रहा था। नतीज़ा - योजना रोज़गार सृजन के मामले में कामयाब नहीं हो सकी। अपने तीन सालों में यह योजना केवल 6.15 लोगों को रोज़गार दिलवा पाई। स्पष्ट है कि वृहत स्तर पर रोज़गार पैदा करने के मामले में यह सफेद हाथी साबित हुई। कुल 41.30 लाख लोगों को इस योजना के अंतर्गत अब तक प्रशिक्षित किया गया है। लेकिन जब रोज़गार ही नहीं मिल पा रहा तो लाभ क्या। प्रशिक्षित करने के लिए तो शिक्षा व्यवस्था में सुधार किए जाने चाहिए थे।

बेरोज़गारी दर उफ़ान पर

2012 में बेरोज़गारी दर 3.6 फ़ीसदी थी जो कि 2014 में घटकर 3.4 फ़ीसदी हो गई लेकिन उसके बाद से बेरोज़गारी दर 3.5 पर बनी हुई है। अगर CMIE की रिपोर्ट पर यक़ीन करें तो बेरोज़गारी दर साढ़े पाँच से उपर है। मार्च में यह 6 को पार कर चुका था। ऐसे समय में जब हम विश्वशक्ति बनने की बात करते हैं, बेरोज़गारी का यह दर हमारे मुँह चिढ़ाता है। यह दर, सरकार की योजनाओं पर एक तमाचा जड़ता है। सरकार के वायदों की पोल पट्टी खोलता है, जिसमें सरकार प्रति वर्ष 2 करोड़ रोज़गार के वायदे करती थी। 

सरकार रोज़गार को लेकर खुद उलझन में

जब सरकार से इस संबंध में प्रश्न पूछे जाते हैं तो संतोषजनक जवाब नहीं मिलता। पीएम मोदी ने रोज़गार के मुद्दे पर कहा था कि समस्या बेरोज़गारी नहीं बल्कि बेरोज़गारी को लेकर आँकड़ों की कमी है। और कुछ दिनों बाद ही संसद में ऑटो आदि से जोड़कर रोज़गार के ऐसे आँकड़े पेश किए, जो किसी भी स्वस्थ मस्तिष्क के लिए परेशानी का सबब हो सकते थे। इन सबसे पहले एक निजी चैनल को इंटरव्यू देते हुए पीएम मोदी ने पकौड़े बेचने को स्वरोज़गार की श्रेणी में रखा था और इसका सहारा लेकर रोज़गार के मामले में अपनी पीठ थपथपाई थी। कुछ दिनों पूर्व ही नितिन गडकरी ने आरक्षण के बाबत बोलते हुए कहा कि आरक्षण लेकर क्या करोगे, जब रोज़गार है ही नहीं। 

निजी या सरकार - रोज़गार के मामले में सब त्रस्त

निजी हो या सरकारी - हर क्षेत्र रोज़गार की समस्या से ग्रस्त है। रेलवे कई सालों में परीक्षाएँ आयोजित करता है और फिर परिणाम से लेकर ज्वाइनिंग तक कई महीनों का समय लग जाता है। बैंक की नौकरियाँ साल दर साल कम हो रही हैं। स्नातक स्तर पर सबसे लोकप्रिय SSC-CGL में भी अभ्यार्थी ज्वाइनिंग की लेट-लतीफी से जूझ रहे हैं। लगभग तीन तीन सालों तक के इंतज़ार के बाद भी उन्हें ज्वाइनिंग नहीं मिलती। SSC-CGL के अभ्यार्थियों के रोष प्रदर्शन को याद करें। कैसे तैयारी करने वाले हज़ारों छात्र-छात्राएँ सरकार और व्यवस्था के खिलाफ खड़े हो गए थे। अलग अलग राज्यों की प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षाओं का स्टेटस निराशजनक है। बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में सरकारी नौकरियों के लिए दिन रात लगाने वाले युवा भ्रष्टाचार और व्यवस्थागत अपंगता को झेलने के लिए मजबूर हैं। ज़रूरी है कि सियासत मंदिर और हिंदु-मुस्लिम को छोड़कर जॉब की बात करे।

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