जब एक महिला ने पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू का गिरेबान पकड़ लिया था.

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जब एक महिला ने पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू का गिरेबान पकड़ लिया था.

जब एक महिला ने पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू का गिरेबान पकड़ लिया था.

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किसी राजनेता को अगर कोई काला झंडा दिखाए या विरोध प्रदर्शन करे तो ज़्यादातर मामलों में ये होता है कि नेता उनसे बात करते हैं और उनकी समस्या को सुनने और सुलझाने की कोशिश करते हैं. अगर सुरक्षा या दूसरे कारणों से राजनेता उसी वक्त विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों से मिल नहीं पाते हैं तो अमूमन पुलिस ये करती है कि विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों को वीआईपी के रास्ते से हटा देती है और मामला वहीं पर ख़त्म हो जाता है. लेकिन भारतीय राजनीति में हालात अब कुछ बदले-बदले से दिखने लगे हैं. भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह 27 जुलाई को इलाहाबाद के दौरे पर थे. इस दौरान इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने अमित शाह के क़ाफ़िले को रोककर उन्हें काला झंडा दिखाया था.

इनमें नेहा यादव, रमा यादव नाम की दो छात्राएं थीं जबकि एक छात्र किशन मौर्य शामिल थे. इन तीनों छात्रों का संबंध समाजवादी पार्टी के छात्र विंग समाजवादी छात्र सभा से है. छात्राओं को पुरुष पुलिसवालों ने दबोचा था और बाल पकड़कर उन्हें घसीटने के बाद सरेआम लाठी भी मारी थी. तीनों के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 147, 188, 341 और 505 के तहत केस दर्ज किया गया था. केस दर्ज होने के बाद उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां मजिस्ट्रेट ने उनकी ज़मानत अर्ज़ी ख़ारिज कर दी थी और ज्यूडिशियल कस्टडी में चौदह दिनों के लिए जेल भेज दिया था.

बाद में इलाहाबाद की सेशन कोर्ट से उन तीनों को ज़मानत मिली.

बेल पर रिहा होने के बाद नेहा यादव ने बीबीसी से बातचीत में कहा, ''विश्वविद्यालय में शोध छात्रों को एक साल तक छात्रावास नहीं मिलती है. मैं ख़ुद उसके लिए संघर्ष कर रही हूं. तमाम समस्याएं हैं जिन्हें लेकर हम लोग महीनों से कुलपति से मिलकर बताना चाह रहे थे, लेकिन कुलपति किसी भी छात्र को समय ही नहीं देते हैं."

"हमने दूसरे अधिकारियों से भी शिकायत की लेकिन कहीं हमारी बात नहीं सुनी गई. अमित शाह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, इलाहाबाद आ रहे थे, हमें लगा कि हम उन तक अपनी बात पहुंचाएंगे लेकिन जब उनसे हमारी मुलाक़ात संभव नहीं हो सकी तो हमने काले झंडे दिखाते हुए 'वापस जाओ' के नारे लगाए. लेकिन सिर्फ़ इतनी ग़लती के लिए हमें बुरी तरह से पीटा गया, अपमानित किया गया और गाड़ी में भरकर थाने लाया गया."

नेहा यादव कहती हैं, "उनकी सुरक्षा में लगे जवानों ने हमें बाल पकड़ कर घसीटा और डंडे बरसाए. रास्ते भर हमें गालियां दी गईं. कोई महिला पुलिस नहीं थी वहां. जेल में भी हमारे साथ इस तरह से व्यवहार हो रहा था जैसे हम कोई अपराधी हों. वहां मौजूद सुरक्षाकर्मी तो ये भी कह रहे थे कि दोबारा ऐसी हरकत की तो तुरंत एनकाउंटर भी हो जाएगा. लेकिन इन सबके बावजूद अमित शाह ने ये जानने की कोशिश नहीं की कि इन लड़कियों के ग़ुस्से या नाराज़गी की वजह क्या है, इनकी शिकायत क्या है. जेल से आने के बाद अपनी समस्याओं को लेकर हमने कुलपति से फिर मिलने का समय मांगा, लेकिन हमें नहीं मिला है.''

इस मामले में इलाहाबाद पुलिस का कहना है कि सबकुछ क़ानून के दायरे में रह कर किया गया है. इलाहाबाद के एसएसपी नितिन तिवारी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, ''क़ानूनी तरीक़े से कार्रवाई की गई है. दो लोगों पर पहले से भी कई मामले दर्ज हैं. हमने सीओ से जांच करने को कहा है कि सुरक्षा में चूक कैसे हुई और इनका मक़सद क्या था.''

मामला ये नहीं है कि छात्रों की सारी बातें सही है या पुलिस जो कह रही है वो सही है. मामला बहुत सीधा सा है कि इस तरह के विरोध पर राजनेता क्या करते रहे हैं.

बीजेपी की राजनीति का एक बहुत अहम हिस्सा है भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की आलोचना. लेकिन जान लेते हैं कि इस तरह के विरोध प्रदर्शन में नेहरू का क्या रुख़ होता था.

बात 1937 की है. स्वतंत्रता आंदोलन ज़ोरों पर था. नेहरू तीसरी बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुन लिए गए थे और देश में उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती जा रही थी.

इसी बीच, कोलकाता से छपने वाले मासिक पत्रिका 'मॉडर्न रिव्यू' में एक लेख छपा, जिसका शीर्षक था 'राष्ट्रपति' और लेखक नाम चाणक्य था.

लेख में कहा जाता है कि "नेहरू को लोग जिस तरह से हाथों हाथ ले रहे हैं और उनकी लोकप्रियता दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है, आशंका इस बात की है कि कहीं वो तानाशाह न बन जाएं. इसलिए नेहरू को रोका जाना बहुत ज़रूरी है."

लेख में अंत में कहा जाता है, "वी वान्ट नो सीज़र्स." बाद में पता चलता है कि चाणक्य कोई और नहीं बल्कि ख़ुद नेहरू ने चाणक्य के फ़र्ज़ी नाम से उस लेख को लिखा था. नेहरू को लगने लगा था कि भारत की जनता उन्हें जिस तरह से देखने लगी है उसमें इस बात का ख़तरा है कि वो एक तानाशाह बन जाएं.

इससे आगे बढ़ते हैं. भारत को आज़ादी मिल चुकी है और नेहरू प्रधानमंत्री बन चुके थे. ये बात है 1949 की. नेहरू ने दिल्ली जेल में बंद डॉक्टर राममनोहर लोहिया के लिए आम की एक टोकरी भिजवाई थी.

उस समय भारत के गृहमंत्री रहे सरदार पटेल को ये बात पसंद नहीं आई. लेकिन नेहरू ने ये कहते हुए बात ख़त्म कर दी कि राजनीति और निजी संबंधों को अलग-अलग नज़रिए से देखा जाना चाहिए.

मामला ये था कि नेपाल में राणाओं ने सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया था. इसके विरोध में डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने अपने समाजवादी साथियों के साथ दिल्ली स्थित नेपाली दूतावास के पास प्रदर्शन किया था. दिल्ली पुलिस ने उन लोगों को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया था. गिरफ़्तार नेताओं में जस्टिस राजेंद्र सच्चर (1923-2018) भी थे.

जस्टिस सच्चर ने ही आम भिजवाने वाली बात लिखी है. उनके अनुसार आम भिजवाने का फ़ैसला तो नेहरू ने किया था लेकिन उसे लोहिया तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी इंदिरा गांधी की थी.

लोहिया और नेहरू कांग्रेस में एक साथ काम कर चुके थे. लोहिया नेहरू को अपना हीरो मानते थे लेकिन आज़ादी के बाद नेहरू और लोहिया के रास्ते अलग हो गए थे. ये वही लोहिया थे जिन्होंने नेहरू की मौत के बाद उन्हें श्रृद्धांजलि देते हुए कहा था, ''1947 के पहले के नेहरू को मेरा सलाम.''

लोहिया के विरोध का तरीका और नेहरू की प्रतिक्रिया

1963 में उत्तर प्रदेश की फ़रुख़ाबाद लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव को जीतकर लोहिया पहली बार लोकसभा पहुंचे थे. संसद में लोहिया नेहरू को 'सिय्डो-सेक्युलर', और न जाने कैसे-कैसे अपशब्द कहते थे, लेकिन नेहरू ने कभी इसको निजी तौर पर नहीं लिया.

बस्तर में गैंगरेप की घटना हो गई थी. संसद में इस पर बहस हो रही थी और नेहरू संसद छोड़कर चले गए थे.

दूसरे दिन संसद परिसर में ही लोहिया ने इंदिरा गांधी को चिकोटी काट ली. नेहरू ने जब लोहिया से नाराज़गी जताई तो लोहिया ने पलटकर जवाब दिया, ''आपकी बेटी को दर्द हुआ तो फ़ौरन बोल पड़े, कल जब बस्तर की बेटियों के साथ हुए बलात्कार पर बात हो रही थी तो आप संसद छोड़कर क्यों चले गए थे.'' नेहरु ने इस पर कुछ नहीं कहा.

पाकिस्तान ने अक्साई चीन के हिस्से को चीन के हवाले कर दिया था. इस पर भारत में बहुत नाराज़गी थी क्योंकि भारत इसे अपना हिस्सा मानता है. संसद में इस पर बहस के दौरान नेहरु ने कहा कि "अक्साई चीन एक बंजर इलाक़ा है, वहां कुछ नहीं उगता." लोहिया ने फ़ौरन खड़े होकर कहा, "आप भी तो गंजे हैं, आपके सर पर बाल नहीं उगता, तो क्या इसे काट दिया जाए." नेहरु ने इसका कोई बुरा नहीं माना.

जब महिला ने नेहरू का गिरेबां पकड़ा

लेकिन इससे भी मज़ेदार क़िस्सा ये है जब एक महिला नेहरू के सामने आ गई और उनका गिरेबान पकड़ लिया. दरअसल लोहिया के कहने पर एक महिला संसद परिसर में आ गईं और नेहरू जैसे ही गाड़ी से उतरे, महिला ने नेहरू का गिरेबान पकड़ लिया और कहा कि "भारत आज़ाद हो गया, तुम देश के प्रधानमंत्री बन गए, मुझ बुढ़िया को क्या मिला." इस पर नेहरू का जवाब था, "आपको ये मिला है कि आप देश के प्रधानमंत्री का गिरेबान पकड़ कर खड़ी हैं."

नेहरू की ज़िंदगी से जुड़े ऐसे कई क़िस्से हैं जो लोकतंत्र में उनके विश्वास को उजागर करते हैं.

ये बात है 1955 की. बिहार में छात्रों पर पुलिस ने फ़ायरिंग की थी. बाद में जब नेहरू पटना पहुंचे तो उस समय 20 साल के एक नौजवान सैय्यद शहाबुद्दीन ने 20 हज़ार छात्रों के साथ पटना हवाई अड्डे पर नेहरु के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया और उन्हें काले झंडे दिखाए.

केवल दो साल के बाद उसी नौजवान ने सिविल सेवा की परीक्षा में सफलता हासिल की. लेकिन ख़ुफ़िया विभाग ने उसी विरोध प्रदर्शन का हवाला देते हुए उन्हें वामपंथी क़रार दिया और उनकी नियुक्ति पर रोक लगा दी.

बाद में जब फाइल नेहरू तक पहुंची तो नेहरू ने ख़ुद अपने हाथों से फ़ाइल पर लिखा कि "उस विरोध प्रदर्शन का राजनीति से कोई संबंध नहीं है और ये नौजवानी के उल्लास (एक्सप्रेशन ऑफ़ यूथफुल एक्जूबिरेंस) में किया गया काम था." विदेश मंत्री रह चुके नटवर सिंह ने ख़ुद शहाबुद्दीन को ये बात बताई और नेहरू की फाइल नोटिंग की एक कॉपी भी शहाबुद्दीन को दी थी.

शहाबुद्दीन विदेश सेवा के लिए चुन लिए गए और जब अटल बिहारी वाजपेयी जनता पार्टी की सरकार में विदेश मंत्री थे, उसी समय शहाबुद्दीन ने नौकरी से इस्तीफ़ा देकर राजनीति में आने का फ़ैसला किया. 80 के दशक में बाबरी मस्जिद और शाहबानो मामले को राजनीतिक मुद्दा बनाकर शहाबुद्दीन एक बड़े नेता बनकर उभरे थे.

वो एक बार राज्यसभा और दो बार लोकसभा के लिए चुने गए. नेहरू ने अगर शहाबुद्दीन को क्लीन चिट नहीं दी होती तो उनका क्या होता ये कहना मुश्किल है.

अलग देश की मांग नागालैंड में आज़ादी के समय से ही उठ रही है. नेहरू की जीवनी लिखने वाले शंकर घोष कहते हैं कि नागा नेता फ़ीज़ो से मुलाक़ात के दौरान नेहरु ने साफ़ कह दिया था कि भारत से अलग होने की बात तो भूल जाइए लेकिन नागालैंड को संविधान के दायरे में रहते हुए बहुत हद तक स्वायत्ता दी जा सकती है.

अप्रैल 1953 में नेहरू ने बर्मा के तत्कालीन प्रधानमंत्री यू नू के साथ नागालैंड का दौरा किया. नागा नेताओं के साथ बैठक चल रही थी तभी कुछ नागा नेता अचानक उठकर चले गए. ये नेहरू के लिए काफ़ी अपमानजनक था क्योंकि दो-दो प्रधानमंत्री की मौजूदगी में नागा नेताओं ने ऐसा किया था. लेकिन नेहरू ने इसका बुरा नहीं माना और उन नेताओं के ख़िलाफ़ किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं हुई.

एक बार नेहरू ने सुप्रीम कोर्ट के एक जज की सार्वजनिक रूप से आलोचना कर दी थी. उन्हें फ़ौरन ही अपनी ग़लती का एहसास हुआ. उन्होंने दूसरे ही दिन उन जज साहब से माफ़ी मांगी और भारत के मुख्य न्यायाधीश को ख़त लिखकर अपने कहे गए शब्दों पर खेद जताया.

नेहरू ने मीडिया पर भी कभी किसी तरह का दबाव बनाने की कोशिश नहीं की.

बॉम्बे के जाने माने पत्रकार डीएफ़ कराका (1911-1974) नेहरु के सबसे बड़े आलोचकों में से एक थे. उनकी किताब 'नेहरू: द लोटस ईटर फ्रॉम कश्मीर' (1953) नेहरू की कई मामलों में कड़ी आलोचना करती है. यहां तक की कई जगह पर तो नेहरू के बारे में कई अपशब्द कहे गए हैं, लेकिन नेहरू ने कभी उस किताब पर पाबंदी लगाने के बारे में नहीं सोचा.

दुर्गा दास हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार में लगातार नेहरू के ख़िलाफ़ लिख रहे थे. नेहरू ने एक बार अख़बार के मालिक जीडी बिड़ला से अपनी नाराज़गी का इज़हार किया. बिड़ला ने साफ़ कह दिया कि वो अख़बार के संपादकीय मामले में कोई दख़ल नहीं देते हैं. नेहरू ये जवाब सुनकर ख़ामोश हो गए और फिर कभी इसका ज़िक्र नहीं किया.

अमरीकी पत्रकार नॉरमन कज़िन्स ने एक बार नेहरू से पूछा था कि वो अपनी कौन सी विरासत छोड़ कर जाना चाहेंगे. इस पर नेहरू का जवाब था, "40 करोड़ भारतीय जो ख़ुद से शासन करना जानते हों."

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