NRC - हमारा भी कोई तो आसरा हो....

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NRC - हमारा भी कोई तो आसरा हो....

NRC - हमारा भी कोई तो आसरा हो....

Author: Neeraj Jha

NRC - आजकल काफी चर्चे में है। विकीपीडिया के अनुसार National Register for Citizens, 1951 की जनगणना के बाद तैयार किया गया एक रजिस्टर है जिसमें असम के नागरिकों की सूची तैयार की गई। इस रजिस्टर का अपडेट होना अहम है क्योंकि असम की बड़ी सीमा बांग्लादेश से लगती है। इस रजिस्टर में केवल वही लोग शामिल हो सकते थे जो - 

  • 1951 के एनआरसी में शामिल लोगों की संतानें हैं या फिर 
  • 24 मार्च 1951 तक किसी इलेक्ट्रोलर रोल या किसी ऐसे काग़ज़ात में शामिल लोगों की संतानें है जो इस दिन से पहले असम में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करता हो।      

असम अकॉर्ड, 1985

1979-85 तक असम ने भीषण रक्तपात झेला। रक्तपात की वज़ह वो लोग थे जो ठिकाना ढ़ूँढ़ते हुए भारत में आ गए थे। 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने असम अकॉर्ड पर हस्ताक्षर किए। जिसके तहत अवैध रूप से 24 मार्च 1971 के बाद भारत में आए बांग्लेदेशी शरणार्थी को वापिस जाना पड़ता। बाद की सरकारों ने इसपर कोई कदम नहीं उठाया। अब उठा है।

40 लाख लोग अवैध!

लगभग 40 लाख लोगों के अस्तित्व पर सवाल उठ रहे हैं। पूरी दुनिया में कोई तो जगह हो जहाँ उन्हें भी रहने का हक़ हो। जहाँ की हवा में वो साँस ले सकते हों बिना किसी एहसान का बोझ उठाए। तीस सालों तक भारतीय आर्मी में सेवाएँ देने वाला जवान अचानक अवैध हो गया। कई ऐसे लोग भी सामने आए जो पहले ड्राफ्ट में वैध थे, लेकिन दूसरे में अवैध हुए। कई परिवारों में एकाध लोगों को छोड़कर बाकी परिवार वैध, तो कहीं-कहीं पूरे का पूरा परिवार ही अवैध दिख रहा है, यहाँ तक कि चुने हुए विधायक भी वैध लोगों की सूची से नदारद हैं। 

नफ़रत के सौदागरों को मिला एक और मौक़ा

हालाँकि कोई फाइनल सूची अभी आई नहीं है। लेकिन ड्राफ्ट्स के ज़रिए लोगों के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा दिया गया है। ऩफ़रत फैलाने वालों को एक और मौक़ा मिल गया, जिसकी बानगी फेसबुक, ट्विटर और टीवी मीडिया पर देखने को मिलती है। इंडिया टीवी ने चलाया - घुसपैठियों को निकालने पर गृहयुद्ध क्यों? रिपब्लिक टीवी ने हैशटेग चलाया - India for Indians. कौन है जो बिना किसी कोर्ट वर्डिक्ट के या फिर पड़ताल के इन लोगों के भारतीय होने को ख़ारिज़ कर रहे हैं। गृह मंत्री का कहना है कि सभी को नागरिकता साबित करने का मौका मिलेगा। अगर आख़िर में अधिकतर लोग इसे साबित करने में सफल हुए तो क्या आज जिस ज़िल्लत को महसूस कर रहे हैं वह दूर हो पाएगा?

विवेकानंद होते तो शर्म से गड़ जाते

मुझे गर्व होता है कि मैं एक ऐसे देश से संबंध रखता हूँ जो विस्थापितों को आश्रय देता है। - स्वामी विवेकानंद ने शिकागो के अपने ऐतिहासिक भाषण में ये बात कही थी। मगर अफ़सोस, आज के हालात होते तो वो ऐसा नहीं कह सकते थे। गर्व का तो पता नहीं लेकिन टीवी हेडलाइंस और नुक्कड़ों पर चल रही बहसों को देखकर शर्मिंदा ज़रूर होते।

2019 के चुनावों की तैयारी है ये सब

सरकार ने अब तक स्पष्ट नहीं किया है कि जो लोग आखिरकार अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाएंगे, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी। उन्हें डिटेंशन सेंटर में रखा जाएगा, भारत से भगा दिया जाएगा या फिर कुछ और। लेकिन  फर्ज़ी राष्ट्रवादी चैनल्स खुलेआम कह रहे हैं कि उन्हें निकाल दिया जाएगा। अगर निकाल भी दिया गया तो कहाँ जाएंगे वे लोग - बांग्लादेश सरकार से क्या इस संबंध में कोई बात की गई है? काफी सवाल हैं जिनके बारे में सरकार ने रुख़ स्पष्ट नहीं किया है, ऐसे में इस बात पर टीआरपी कमाने और देशभक्ति के नाम पर लोगों को उकसाने का प्रोपैगेडा क्यों चलाया जा रहा है? क्यों सोशल मीडिया पर इन लोगों के खिलाफ आग उगला जा रहा है? क्यों बीजेपी के कुछ नेता इस आग में घी डाल रहे हैं? क्यों ममता बनर्जी गृह युद्ध की चेतावनी/धमकी दे रही हैं? इन सबका जवाब है - 2019 का लोकसभा चुनाव। 

जिस देश में बिताई ज़िंदगी, वहीं हो गए अवैध

ये चालीस लाख लोग अत्यंत गरीब तबके से संबंध रखते हैं। ये वो लोग हैं जिनकी पूरी ज़िंदगी अहसानों के अहसास के बोझ तले दबा दिया गया है। ये वो लोग हैं जिन्हें, जब जिसकी मर्ज़ी तब वह हरका देता है। 1947 या 1971 का बँटवारा इन लोगों की मर्ज़ी से नहीं हुआ था। लेकिन तब से अब तक ये उसका दंश झेल रहे हैं। जिस मुल्क़ को अपना मानते हुए पूरी ज़िंदगी इन लोगों ने खपा दी, एकदम से उस मुल्क़ में उन्हें अवैध बता दिया जाता है। 

1971 में जब पूर्वी पाकिस्तान, बांग्लादेश बना, तब से सीमा पार से लोगों का आना जाना बढ़ गया। हालाँकि लोगों का आना आज़ादी के बाद से ही चल रहा था। जो लोग एक मुस्लिम राष्ट्र चाहते थे वे पाकिस्तान गए। जो नहीं चाहते थे वे ले जाए गए। कुछ वापिस आए, जिनका विश्वास गंगा जमुनी तहज़ीब में था। सीमा पार से आए लोग बांग्लादेशी या पाकिस्तानी नहीं बल्कि संभवतः वे लोग हैं जिनकी आस्था सांझी संस्कृति में थी। जिन्हें उपवन पसंद हो, जहाँ हर तरह का फूल खिलता हो।

सोशल मीडिया पर बोया जा रहा है नफ़रत का बीज

“गूँहखोर सूअर हैं साले - भगाओ इनको।” “इन घुसपैठियों बांग्लादेशियों को देश से बाहर निकाल फेंको।” - फेसबुक, ट्विटर आदि ऐसे वाक्यों से भरा हुआ है। निजी तौर पर सोचिए कैसी होगी मानसिक दशा जब कोई इस तरह की बात आपके लिए करे। ख़ैर इतना सोचने समझने की शक्ति अब बची कहाँ है। अब तो बस समझ आती है एक ही बात कि देश का एक ही धर्म होना चाहिए, एक ही भाषा होनी चाहिए, एक ही संस्कृति, एक ही तौर तरीका, एक ही खान-पान, एक ही वेश-भूषा। इंसान तो बचे ही नहीं कि सोचेंगे। बचे हैं कुछ बहुसंख्यक हिंदु, अल्पसंख्यक मुस्लिम, सिख, इसाई, जैन, वौद्ध, ब्राह्मण, दलित, शिया, सुन्नी आदि। 

ख़ैर, उम्मीद है कि कदम किसी को भगाने की दृष्टि से नहीं बल्कि सम्मान दिलाने की दृष्टि से उठाया गया है। ज़िंदगी का सम्मान। जिसका उल्लेख हमारे संविधान में भी है। लेकिन इस उम्मीद को टीवी चैनल्स की हेडलाइंस, सत्तालोलुप नेताओं की ओछी बयानबाज़ियाँ और सोशल मीडिया के कुपढ़ यूज़र्स कमज़ोर कर देते हैं।

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