क्या है संसद की मर्यादा - प्रेम या अहंकार?
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क्या है संसद की मर्यादा - प्रेम या अहंकार?

Author: Neeraj Jha calender  21 Jul 2018

क्या है संसद की मर्यादा - प्रेम या अहंकार?

“…तभी एक चायवाला इस देश का प्रधानमंत्री बन सका।” - राजनाथ सिंह के इस बयान ने कल निराश किया। सांसदों की तालियों ने निराशा को और बढ़ा दिया। चार साल तक सत्ता में रहने के बाद भी अगर देश के गृहमंत्री को इस बात पर तालियाँ बजवानी पड़ी तो स्थिति शर्मनाक है। यह दर्शाती है कि शायद धरातल पर ऐसा कोई काम नहीं हुआ जो प्रशंसनीय हो।

बहरहाल, कल के अविश्वास प्रस्ताव में दो बातें हृदय विदारक थीं। एक तो ये कि संसद के अंदर हुई भाषणबाज़ी ने मुद्दों को गौण कर दिया। दूसरा यह कि भक्ति के चरम ने लोगों को शालीनता और प्रेम के ख़िलाफ ख़ड़ा कर दिया। किसी कवि के शब्दों में बात गरीबी रेखा पर होनी थी लेकिन रेखा की गरीबी पर होती रही। ख़ैर, पूरा अविश्वास प्रस्ताव भाषणबाज़ी, आँखों की हरक़त और गले लगने/पड़ने को लेकर याद किया जाएगा।

क्या है भारतीयता?

कल के अविश्वास प्रस्ताव ने विपक्ष को संजीवनी प्रदान की है। उसकी चर्चा से पहले एक दो सवालों पर गौर करना ज़रूरी है। जैसे- नफ़रत या मोहब्बत, अहंकार या शिष्टाचार - आख़िर क्या है हमारे देश की संस्कृति? मंचों पर लच्छेदार भाषण देने वाले बड़े-बड़े वक्ता अक्सर कहते हैं कि मोहब्बत और शिष्टाचार भारतीयता है। तो क्या संसद भवन भारतीय संस्कृति से अलग है? 

राहुल या मोदी - कौन अशिष्ट

लगभग हर एक टीवी चैनल, ने कल के अविश्वास प्रस्ताव को राहुल की आँखों और उनके गले लगने की हरकत में बाँध कर रख दिया। सभी को प्रोटोकॉल्स याद आने लगे। गले लगने में अशिष्टता दिखी। लेकिन देश के पीएम के द्वारा नेहरु और पूर्व दिग्गज़ों को अपमानित करना, मदारियों की तरह हाथों के इशारे करना उन्हें वाज़िब लगा। लगभग सभी टीवी चैनल्स भक्ति रस में डूबे हुए अपने प्रभु की हर बात को सही सिद्ध करने पर लगे रहे। 

महागठबंधन को मिली संजीवनी

लेकिन, लोकसभा टीवी के सौजन्य से और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से लोगों ने सबकुछ अपनी आँखों से देखा, कानों से सुना और दिमाग से उस पर विचार भी किया ही होगा। इसलिए, कल के दिन को कितना भी तोड़-मरोड़ लिया जाए, यह बात कोई दरकिनार नहीं कर सकता कि राहुल गाँधी ने महागठबंधन के ख़्वाब देखने वाली आँखों की चमक बढ़ा दी। इस बात से भी कोई इंकार नहीं कर सकता कि कांग्रेस अध्यक्ष ने बीजेपी के खेमे को बेचैन कर दिया। 

राहुल की भाषणों में इमोशनल टच के साथ थे तथ्य और आँकड़े

पीएम मोदी और राहुल गाँधी के भाषणों की तुलना कर लें। राहुल ने इमोशनल बातें की लेकिन उन बातों में भारतीय आदर्शों का दर्शन था। भारतीय परंपराओं का बोध था। उन बातों में प्रेम की स्थापना का दम था। इसके अलावा राहुल ने वे सवाल भी पूछे जिनसे बीजेपी पीछा छुड़ाना चाहती है। जिनका जवाब कोई भी नेता, यहाँ तक कि पीएम भी नहीं देना चाहते। या फिर यों कहें, जिन सवालों का जवाब सरकार के मंत्रियों के पास है ही नहीं। 

हर मुद्दे पर उठाए सवाल

राहुल ने पंद्रह लाख रुपयों के बारे मे पूछा, राफेल डील पर सरकार को घेरा, रोज़गार के मुद्दे पर सरकार को कठघरे में खड़ा किया, जीएसटी और नोटबंदी के कारण लोगों को हुई परेशानियों का जिक्र किया, अंबानी को घेरा, जियो के इश्तेहार पर पीएम की फोटो पर सवाल दागे, उद्योगपतियों और सरकार की सांठगाँठ की बात की और जय शाह के मामले को सदन के पटल पर रखा। राहुल ने ज़रूरी तर्क भी दिए। भाव भंगिमा में आत्मविश्वास भी था और विरासतों का गौरव भी। राजनैतिक ड्रामे का भी उपयोग किया और ऐसे ड्रामे का जिससे कुछ नकारात्मक नहीं निकलता। 

लोकसभा के अंदर पीएम ने दिया जनसभाओं वाला भाषण

इसके उलट पीएम मोदी ने सदन में बिल्कुल वैसा ही भाषण दिया जैसा वे चुनावी मंचों पर दिया करते हैं। नेहरु, गाँधी, इंदिरा को कोसना उनके भाषण की प्रथमिकता बनी रही। राहुल के गले मिलने के उलट उन्होंने जिस तरह से मिमिक्री की या राहुल के आँख मारने पर जिस तरह का इशारी किया वह आँख मारने से कहीं ज्यादा अशिष्ट और असभ्य था। पीएम मोदी अपने अंदाज़-ए-बयाँ के लिए जाने जाते हैं। लेकिन कल लोकसभा मे उनके अंदर वर्सिटैलिटी की कमी दिखी। पीएम ने राहुल के सवालों के जवाब देने की कोशिश तो की लेकिन केवल लफ़्फाज़ी के ज़रिए। कोई ठोस आँकड़ा उन्होंने सामने नहीं रखा। राफेल डील पर उन्होंने कहा कि सत्य को कुचला गया, इसे रौंदा गया - लेकिन पीएम ने उस सत्य को उद्धाटित नहीं किया। दरअसल, राहुल का सवाल भी उस सत्य की खोज कर रहा था। 

क्या शिष्ट - क्या अशिष्ट

पीएम मोदी, सुमित्रा महाजन और अन्य नेताओं ने राहुल गाँधी के आँख मटकाने की बात पर खूब ज़ोर दिया और इसे असभ्य बताया। सुमित्रा जी ने राहुल द्वारा पीएम को गले लगाने को भी अशिष्ट बताया। लेकिन पीएम द्वारा राहुल को वापिस बुलाकर फिर से गले लगाना क्या शिष्टता के दायरे मे था? मुमकिन है कि लोकसभा की मर्यादा ऐसा करने से रोकती हो लेकिन इसमें कुछ ग़लता नहीं था। दो विरोधी विचारधाराओं के नेता आपस में गले मिलें - यही भारतीयता है।

सोशल मीडिया पर राहुल के आँख मारने पर जिन तथाकथित विद्वानों या टीवी चैनलों पर एंकरों ने कोहराम मचाया हुआ है, उन्होंने बीजेपी द्वारा कर्नाटक चुनावों के लिए चुने गए उन उम्मीदवारों के बारे में कुछ नहीं बोला, जिन्हें पाँच - छह साल पहले लोक सभा के अंदर पॉर्न देखते हुए पकड़ा गया था (वे सब जो उस वक्त भी आज जितना ही लिखते, पढ़ते और बोलते रहे हों)।

राहुल गाँधी की छवि - बिगड़ी या सुधरी

कुल मिलाकर, कल लोकसभा मे जो भी हुआ वह विपक्ष के लिए संजीवनी था। राहुल गाँधी में एक नेता दिख रहा था। एक ऐसा नेता, जो आँकड़ों और तथ्यों के आधार पर सवाल करना जानता हो। महागठबंधन के लिए ये संकेत सकारात्मक हैं। वहीं नरेंद्र मोदी और सरकार दोनों की चिंताएँ बढ़ गई होंगी। कल लोकसभा में उन्होंने वही बातें की जो सरकार को विचलित कर पाने में सक्षम थी। धर्म से जुड़ा कोई मसअला राहुल ने नहीं उठाया। क्योंकि शायद वे जानते थे कि इस मामले में बीजेपी उनसे कोसों आगे है। कल के लोकसभा में राहुल और मोदी के भाषणों ने 2019 के आगामी चुनावों को थोड़ा दिलचस्प बना दिया है।

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