हिंदू पाकिस्तान - कितना वाज़िब है डर?
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हिंदू पाकिस्तान - कितना वाज़िब है डर?

Author: Neeraj Jha calender  16 Jul 2018

हिंदू पाकिस्तान - कितना वाज़िब है डर?

एक सच्चे शिष्य के नाते मोदी दीन दयाल उपाध्याय के कामों का प्रचारित और प्रसारित करने के लिए जो कर रहे हैं वह समझ में आता है। लेकिन संविधान को होली बुक कहने वाले पीएम के रूप में, संविधान को ख़ारिज़ करने वाले उपाध्याय से उनका लगाव देश और संविधान के लिए ख़तरनाक है। बीजेपी के विचारों में दोहरापन नया नहीं है। एक तरफ संविधान तो दूसरी तरफ दीन दयाल, एक तरफ गाँधी तो दूसरी तरफ गोड्से - बीजेपी विरासत की कमियों और पूर्वजों की मक्कारी से ग्रस्त है।

बीजेपी के पास विरासत में कुछ दमदार नहीं

दरअसल, एक अच्छे वंशज के नाते वह अपने पूर्वजों को स्थापित तो करना चाहती है, लेकिन पूर्वजों को स्थापित करने के लिए उनकी शून्यसम विचारधारा का सहारा नहीं ले सकती। इसीलिए बीजेपी और पीएम मोदी के कामों में विरोधाभास दिखता है। और यही विरोधाभास इस डर को जन्म देता है कि कहीं संविधान को बदल न दिया जाए। संख्याबल मिलने पर कहीं उन ओछी विचारधाराओं को लागू न कर दिया जाए जिस तरह की कुंठित विचारधाराओं ने पाकिस्तान को जन्म दिया था। यही डर शशि थरूर को कहने पर मजबूर करता है कि कहीं हमारा देश हिंदू - पाकिस्तान न बन जाए।

संविधान विरोधी बातों का बन गया है ट्रेंड

इस डर को और अधिक फैलाने का काम बीजेपी के नेता, विधायक, सांसद और मंत्री कर रहे हैं। जब एक निर्वाचित विधायक खुलेआम कहता है कि अगला चुनाव हिंदू बनाम मुस्लिम होगा, जब एक केंद्रीय मंत्री सरे आम कहता है कि संविधान बदलेगा। हम इसे बदलने के लिए ही आए हैं, जब सांसदों के लिए बिजली, पानी, शिक्षा या स्वास्थ्य से बढ़कर राम मंदिर हो जाए तो डर लगना जायज़ है। जब मज़हब की आड़ में चुने हुए विधायक बलात्कारियों का समर्थन करें, जब जाति के नाम पर लोगों के साथ बर्बरता की जाए तब ये डर लगना जायज़ है। यही वो कारण हैं जो सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि कहीं संख्याबल मिलने पर बीजेपी संविधान न बदल दे। और इस सोच को पुख़ता करती है बीजेपी की विरासत जो गोलवलकर और दीन दयाल उपाध्याय के संदेशों के रूप में जन संघ के रास्ते इन तक पहुँची है।

बीजेपी की पितृ संस्था की नहीं थी संविधान में आस्था

दरअसल, बीजेपी के द्वारा संविधान का अपमान नई बात नहीं है। बल्कि भारतीय जन संघ के संस्थापक सदस्यों ने शुरू से ही संविधान का सम्मान नहीं किया। संविधान बराबरी की बात करता है और हिंदुत्व की राजनीति करने वाले लोग "एकोहम द्वितीयो नास्ति" के घमण्ड में जीते हैं। अपने पंथ को छोड़कर उन्हें लगभग हर पंथ निम्न लगता है। “मुस्लिमों का तुष्टिकरण मत करिए, उनसे किनारा मत करिए बल्कि उन्हें शुद्ध करिए” - दीन दयाल उपाध्याय का ये कथन उनके दिमाग में मुस्लिमों के प्रति भरी हुई नफ़रत का जीता जागता उदाहरण है। भारतीय जनता पार्टी की आत्मा का निर्माण करने वाले उपाध्याय मुस्लिमों को देशद्रोही, पंथ-निरपेक्षता को भारतीयता पर किया गया प्रहार, फेडरलिज़्म को अलगाववादी मानसिकता का द्योतक और संविधान को आंग्ल-भारतीय मसौदा (जिसे एक भारतीय होने के नाते कभी स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए) मानते थे। 

संविधान विरोधी हैं दीन दयाल और गोलवलकर के विचार

नरेंद्र मोदी ने दीन दयाल उपाध्याय को प्रचारित और उनकी शिक्षाओं को प्रसारित करने के लिए काफी प्रयास किए हैं। हर सरकारी लाइब्रेरी में उनसे जुड़ी किताबें रखवाई गई हैं। मंत्रियों को आदेश दिए गए हैं कि उनको लेकर सेमिनार करवाए जाएँ। स्वाभाविक है। नरेंद्र मोदी जिस पार्टी से आते हैं, उस पार्टी की शिराओं में जो रक्त बहता है उसका निर्माण दीन दयील के उपदेशों से हुआ है। उन उपदेशों से जो शायद भारतीयता को कभी समझ ही नहीं पाए। जिनका हृदय इतना संकुचित था कि पूरी ज़िंदगी बदला लेने के उद्देश्य से गुज़ार दिया। आरएसएस के प्रमुख विचारक उपाध्याय असल में हिंदुत्व का मतलब ताउम्र समझ नहीं सके। तभी उन्होंने स्वीकार करना नहीं सीखा। नरेंद्र मोदी जिन दीन दयाल उपाध्याय को गुरु मानते हैं उनके गुर गोलवलकर नाज़ियों के समर्थक थे। अपनी किताब We or our Nationhood Defined में उन्होंने लिखा है - 

विदेशी तत्वों के पास केवल दो रास्ते हैं- या तो वे हिंदू धर्म को अपना लें या पिर हिंदुओँ की दया पर तब तक इस देश में रहें जब तक राष्ट्रीय हित इसकी मंज़ूरी देता हो। या तो वे किसी और का नहीं बल्कि हिंदू संस्कृति के वैभव का गुण गाएँ, अपने अस्तित्व को भूलकर हिंदू संस्कृति में विलीन हो जाएँ या फिर अपने आप को हिंदुओं के अधीन मान कर गुज़र बसर करें। न तो किसी संसाधन पर अपना अधिकार समझें और न हीं किसी भी तरह की इच्छा रखें। 

यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि गोलवलकर जी के अनुसार सभी गैर - हिंदू संप्रदाय के लोग विदेशी और अशुद्ध थे। पागलपन से भरी अपनी इसी विचारधारा के कारण गोलवलकर नाज़ियों का समर्थन करते दिखते हैं। वे कहते थे कि जिस तरह अपनी नस्ल को नाज़ियों ने बचाया, हिंदुस्तानियों को उससे सबक लेनी चाहिए।  

इस तरह की विचारधारा जिस पार्टी की नींव हो, आख़िर उस पार्टी से संविधान के सम्मान की अपेक्षा कहाँ तक की जा सकती है? बेशक प्रधानमंत्री मोदी संविधान को होली बुक कह देते हों, बेशक वे गाँधी की प्रतिमा, गाँधी के चरख़े के साथ फोटो खिंचवा लेते हों लेकिन उन्होंने कभी संविधान विरोधी विचारधाराओं को ललकारा नहीं, उन्होंने कभी गोड्से की आलोचना नहीं की। यह प्रधानमंत्री मोदी की वैचारिक कमज़ोरी है। 

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