देश चूहा नहीं है मोदीजी!
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देश चूहा नहीं है मोदीजी!

Author: Neeraj Jha calender  10 Jul 2018

देश चूहा नहीं है मोदीजी!

अमेरिकी विचारक एल्बर्ट हबार्ड ने कहा था कि आपके जीवन की सबसे बड़ी ग़लती निरंतर यह सोचना है कि कहीं आप कोई ग़लती न कर दें। औरों का तो पता नहीं लेकिन हमारे देश के प्रधानमंत्री ने एल्बर्ट की इस सूक्ति को आत्मसात कर लिया है।

कभी चंद्रगुप्त को लेकर ग़लत बोल देते हैं तो कभी भगत सिंह के नाम पर लोगों को बरगला देते हैं। कभी नेहरु जी को ग़लत साबित करने के लिए ग़लत तथ्यों का सहारा लेते हैं तो कभी अलग अलग सदियों में जन्म लेने वाले महापुरुषों को इकट्ठा बिठा देते हैं। लगता ही नहीं कि कभी सोचा हो कि जो बोल रहे हैं वो सही भी है या नहीं। लेकिन प्रधानमंत्री जी एल्बर्ट की सूक्ति को इतना भी क्या दिल से लगाना। अपनी नहीं, अपने पद की गरिमा तो रख लीजिए - नुकसान नहीं होगा।

फेक न्यूज़ पर बवाल

बिल्कुल ताज़ा ताज़ा घटना देखिए। एक तरफ व्हाट्सएप से बातचीत कर रही है सरकार फेक न्यूज़ रोकने के सिलसिले में, दूसरी तरफ बीजेपी के नेतागण फेक न्यूज़ को जमकर बढ़ावा दे रहे हैं। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह आईटी सेल वालों को साइबर योद्धा कहते हैं। उनसे आग की तरह फैल जाने का आह्वान करते हैं। दोहरा चरित्र अपना कर सरकार चलाना मुश्किल नहीं होता क्या? या फिर आदत हो गई है इस तरह जीने की।

भ्रष्टाचार रोकने में साबित हुए हैं नाकाबिल

“न खाउँगा न खाने दूँगा” - अमित शाह, जय शाह, अंबानी, अडानी, पीयूष गोयल, माल्या, नीरव मोदी आदि को इस नारे से एग्जेम्पशन मिली हुई है क्या। राजनैतिक दलों के फॉरन चंदे को लीगलाइज़ करके आपने भ्रष्टाचार के विकास में जो कदम बढ़ाया है उसके लिए भ्रष्टाचार देवता हमेशा आपके आभारी होंगे। आपके नारे बहुत सुंदर होते हैं। बोलते और सुनते हुए अच्छा लगता है। लेकिन हर नारे के अंत में अदृश्य सा एक जो स्टार होता है न, उसने देशवासियों के अच्छे दिन को रोका हुआ है। अपने नारों में से ये स्टार हटा लीजिए। नारों को विशुद्ध रूप से हर किसी के लिए समान तरीके से काम करने दीजिए।

न काला धन आया न 15 लाख रुपए

चुने जाने से पहले आपने कहा था कि आम लोगों के अकाउंट में 15 लाख रुपए आएँगे। ये कैलकुलेशन स्विस बैंक में जमा कालेधन के आधार पर किया गया था। काला धन देश में वापिस लाना आपकी सबसे बड़ी प्राथमिकता दिखती थी, लेकिन प्रधानमंत्री बनते ही आपकी प्राथमिकताएँ बदल गई। लोग इंतज़ार कर रहे हैं 15 लाख का जबकि नोटबंदी के बाद तो लोगों के हज़ार पंद्रह सौ की आज़ादी पर भी ख़तरा मंडराने लगा है। उधर स्विस बैंक में हमारी जमा पूँजी लगातार बढ़ रही है। ये जो स्विस बैंक में पैसा बढ़ा है - ये काला है कि सफ़ेद? अब ये विचार करने वाली बात है कि हर व्यक्ति को 15 लाख रुपए मिलने के मामले में आपका कैलकुलेशन ग़लत था या आपका नज़रिया!

रोज़गार के नाम पर युवाओं को भी लगा दिया चूना

मोदी जी, युवाओं का बड़ा मोह जगा था आपके प्रति, रोज़गार को लेकर किए गए आपके दावों के कारण। आपने अपने भाषणों से आश्वस्त कर दिया था कि युवाओं को रोज़गार के ऐसे अवसर मिलने वाले हैं जैसा उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा। ऐसा लगो मानो, नौकरियाँ दरवाज़े पर दस्तक देने लगेंगी। 2 करोड़ नौकरियाँ सालाना। लेकिन मोदी जी, इस दावे में आपने यह नहीं बताया कि नौकरियाँ आईटी सेल मे बढ़ेंगी, ट्रोल्स के रूप में बढ़ेंगी। आपने यह नहीं बताया कि समोसा और पकौड़ा बेचना भी नौकरियों में गिना जाएगा। यह सब पहले बताना चाहिए था। लोगों को भ्रम में रखना ग़लत था।

पढ़ने की तो दूर बेटी बच नहीं पा रही बेटियाँ

महिलाओं ने भी आपसे काफी उम्मीदें पाली थी। वीभत्स निर्भया कांड के बाद आपके बयान सुनकर लगा था कि अगर आपको सत्ता मिली तो महिलाओं को वही महत्व मिलेगा जो “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:” को मानने वाले देश में मिलनी चाहिए। लेकिन उनके खिलाफ अपराधों ग्राफ बढ़ता ही नज़र आ रहा है। कठुआ, उज्जैन, मंदसौर, दिल्ली, गुरुग्राम, पानीपत आदि लगभग देश के हर शहर में लड़कियों का खुलेआम घूमना दूभर हो गया है। इन मामलों में आपसे अपेक्षा थी कि कम से कम एक्शन लेते, पीड़ितों से संवाद करते, शोषकों को ललकारते लेकिन नहीं मोदी जी, आपने मौन का रास्ता चुना।वही मौन, जिसके लिए आपने मनमोहन सिंह को पानी पी-पी कर गरियाया था। आपने शब्दों को मंचों तक सीमित रखा- ये ग़लत था। आपने गंभर मुद्दों पर चुप्पी की चादर ओढ़ी जो ग़लत था।

महँगाई की मार - जनता लाचार

महँगाई के नाम पर आपने यूपीए सरकार को जो घेरा था, वह अद्भुत था। लोगों को ऐसा विश्वास था कि आपके शासन में महँगाई जैसी कोई समस्या सामने आएगी ही नहीं। लोगों को लगता था कि आपके राज में रुपया की कीमत बढ़ती चली जाएगी और बाज़ार की कीमत घटती। पेट्रोल, डीज़ल, साग-सब्जी और अन्य वस्तुएँ मध्यमवर्गीय परिवार की जेब के लायक हो जाएगी, लेकिन मोदी जी हुआ बिल्कुल उल्टा। कीमतों के नज़रिए से पेट्रोल और डीज़ल ने सोना चाँदी का रूप अख़्तियार कर लिया है। रुपया बिल्कुल वैसे ही गिरा जा रहा है जैसे आपके राज में सामाजिक सांप्रदायिक सौहार्द्र।

हर वर्ग सड़क पर उतर कर कर रहा है विरोध

कितने वर्गों की बात करें मोदी जी! नोटबंदी के ज़रिए आपने देश की उन हज़ारों औरतों को चोर साबित कर दिया, जो घर के कामों के लिए ही घर चलाने वाले खर्चे में से कुछ थोड़ा बहुत बचा कर रख लेती थी, सबसे छुपाकर। आपने उन मंझोले व्यापारियों की कमर तोड़ दी जो रोज़ की खरीद और बेच के कारोबार से जुड़े थे। आपने उन किसानों को ठगा जिनके लिए कैश के अलावा पैसा संग्रह करने का और कोई सुलभ साधन नहीं।

आपने पूरे देश को लाइन में खड़ा करवा दिया। देश खड़ा भी हुआ लेकिन हासिल क्या हुआ मोदी जी। आज देश में नोटबंदी से पहले के मुकाबले ज्यादा कैश सरकुलेशन में है। कश्मीर में पत्थरबाज़ी और मिलिटेंसी की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। बैंकों की हालत खराब हो गई है। आपने पचास दिन का समय मांगा था लेकिन लगभग डेढ़ साल बाद भी देश कैश क्रंच से जूझ रहा है। यहाँ भी आपसे चूक हुई।

जीएसटी को आपने अपने प्रबंधन कौशल और पीआर कौशल के ज़रिए खूब हाइप किया। ऐसी दलीलें दी कि लोग टैक्स भरने के नाम पर खुश हो गए। देश ने एक बार फिर आपसे सहमति जताई लेकिन आपका विज़न इस बार बी कमज़ोर निकला। खुद आपके मंत्रियों तक को जीएसटी का फॉर्म्यूला समझ नहीं आया। मँझले उद्योगपति तबाह हो गए। गुजरात में विरोध हुआ तो स्लैब रेट चेंज कर दिए गए। क्यों? क्या दूरदृष्टि जैसी किसी बात में आपका विश्वास नहीं?

एडवरटाइज़िंग में इतने पैसे - आख़िर कैसे

एक और बात, आप अक्सर कहा करते थे कि माँ-बेटे (सोनिया-राहुल) ने देश का ख़ज़ाना खाली कर दिया। अगर ख़ज़ाना खाली था तो सरकारी एडवरटाइजिंग और पीआर पर आपकी सरकार के शुरुआती साढ़े तीन साल में जो खर्च हुआ वो कैसे? मोदी जी, उपरोक्त अवधि में एडवरटाइजिंग और पीआर पर आपकी सरकार ने जितना खर्च किया वो मंगलयान मिशन के कुल खर्चे से आठ गुणा था।

मोदी जी, मात्र योजनाएँ बना देना सरकार का काम नहीं न ही इसको प्रचारित भर कर देना सरकार का काम होता है। सरकार अपनी बनाई हुई योजनाओं की सफलता और असफलता की ज़िम्मेदार होती है। आपके वादों की धरातलीय हकीकत, आपकी योजनाओं की अंतिम पहुँच ही आपका विश्लेषण करेगी। देश चूहा नहीं है, जिसपर आप एक्सपेरीमेंट करते रहें।

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