क्या ब्रांडिंग और एडवरटाइजिंग ही है सरकार का लक्ष्य?
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क्या ब्रांडिंग और एडवरटाइजिंग ही है सरकार का लक्ष्य?

Author: Neeraj Jha calender  18 Jun 2018

क्या ब्रांडिंग और एडवरटाइजिंग ही है सरकार का लक्ष्य?

3755 करोड़ रुपए - ये है मई 2014 से दिसंबर 2017 तक विज्ञापनों पर मोदी सरकार का हुआ खर्चा। गौरतलब है कि मंगलयान मिशन 450 करोड़ रुपए में पूरा किया गया था। मतलब मंगलयान मिशन के कुल खर्चे से लगभग 8 गुणा ज्यादा पैसा मोदी सरकार ने अपने प्रचार पर खर्च कर दिए। रंग-बिरंगे नारों के साथ केंद्र की सत्ता में आने वाली बीजेपी सरकार के अधिकतर नारों का रंग फीका पड़ चुका है। हालात ये हैं कि भारी मैनडेट के साथ सत्ता में आने के बाद 4 सालों तक सत्ता में रहने के बावज़ूद मोदी सरकार के लोग अपने काम गिनाने की जगह विपक्षियों पर हमले और विज्ञापनों के माध्यम से नारेबाज़ी कर रहे हैं।

26 मई को मोदी सरकार के 4 साल पूरे होने पर लगभग हर अख़बार और समाचार चैनल्स के स्क्रीन प्रचारों से भरी रही। प्रिंट मीडिया में कुल 54 दावे किए गए जिनमें सच्चाई कम और लफ़्फाज़ी ज्यादा रही। दावों की पुनरावृत्ति भी की गई। उसके बाद भी प्रधानमंत्री खुद और अन्य मंत्रीगण सरकार को लेकर तरह तरह के दावे ठोंकते रहते हैं, ज़मीन पर जिनकी सच्चाई रत्ती भर भी नहीं होती।

जानिए कुछ दावों की हक़ीकत - 

दावा - 7.25 लाख शौचालय बनवाए गए।
हकीकत - दावा बिल्कुल ठीक है लेकिन केवल एक पहलु को दर्शाता है। दावा यह नहीं बताता कि 60 प्रतिशत शौचालयों में पानी की सुविधा नहीं है वहीं 40 प्रतिशत शौचालय ड्रेनेज सिस्टम से नहीं जुड़े। दावा - 'पब्लिक, प्राइवेट और पर्सनल सेक्टर में विभिन्न तरीक़ों से युवाओं को आगे बढ़ने के मज़बूत अवसर.’ हकीकत इससे बिल्कुल विपरीत है और इन तस्वीरों में देखा जा सकता है। जहाँ एसएससी के खिलाफ लोग धरने पर बैठे हैं। प्राइवेट कंपनियाँ मास फायरिंग कर रही हैं।

दावा - नोटबंदी से अब तक के सबसे ज्यादा काले धन का पर्दा फाश
हकीकत - 
न जाने ये काला धन कौन सा है जो सरकार सबसे छिपा कर रख रही है। कौन सा काला धन पकड़ा गया है और उससे देश की अर्थव्यवस्था को क्या बूम मिला है- कोई नहीं बताता। सच्चाई तो ये है कि प्रचलन में जितने भी नोट थे वापिस बैंकिंग सिस्टम में आ गए।

दावा - भ्रष्टाचार कम हुआ
हकीकत - 
यदि कहा जाए कि बीजेपी यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार की ढ़ेर पर खड़ी होकर उसे कुचलने के वादे के साथ सत्ता में आई थी तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। लेकिन चार साल गुजरने के बाद भी भ्रष्टाचार के विरुद्ध ऐसा कोई कानून या कोई योजना नहीं है जो भ्रष्टाचार में कमी के लिए आश्वस्त करती हो। सारंग गडकरी हों या जय शाह - नेताओं के परिजन पैसे बना रहे हैं। आम लोग त्रस्त हैं। सरकार ने पॉलीटिकल पार्टियों की फॉरन फंडिंग को कानून की सहायता से और अधिक अपारदर्शी बना दिया है।

दावा- एससी एसटी एक्ट को मजबूत बनाया गया
हकीकत - 
पूरा एससी एसटी समाज इस एक्ट के विरोध में खड़ा हो गया था, वो भी बिना किसी नेतृत्व के। भाजपा के अपने दलित नेताओं ने इसका विरोध किया। किस आधार पर सरकार ने ये दावा ठोंक दिया, समझ से परे है।

दावा - किसान की आय दोगुनी करने के लिए बहुआयामी प्रयास
हकीकत - बीजेपी के भागीरथ प्रयासों की लंबी चौड़ी लिस्ट है और उसमें एक और प्रयास जोड़ दिया गया है। ये प्रयास जिसके लिए किए जा रहे हैं न तो उसे दिख रहा है और न ही किसी और को। सच्चाई ये है कि किसान कर्ज़ के बोझ में दबकर आत्महत्याएँ करने को मजबूर है।

दावा - जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में भारत की मुक्य भूमिका
हकीकत - हकीकत यह है कि आज दुनिया के सबसे प्रदूषित 15 शहरों में से 14 हमारे देश से हैं। और प्रदूषण कम करने के लिए पिछले तीन सालों का बजट 56.8 करोड़ रुपए रहा है।

दावा - स्किल इंडिया के माध्यम से एक करोड़ से अधिक युवाओं को प्रशिक्षण
हकीकत - ठीक बात। मान लेते हैं की दावा सही है लेकिन उन युवाओं की प्लेसमेंट के संबंध में कोई जानकारी क्यों नहीं दी गई है? प्रशिक्षण की तो ज़रूरत ही इसलिए पड़ी थी कि युवाओं को रोज़गार मिल सके लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अगर केवल प्रशिक्षित करना उद्देश्य था तो शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए योजना बनानी चाहिए थी।

दावा - 'पब्लिक, प्राइवेट और पर्सनल सेक्टर में विभिन्न तरीक़ों से युवाओं को आगे बढ़ने के मज़बूत अवसर.’
हकीकत - ये कौन से अवसर हैं जो केवल मोदी सरकार को ही दिख रहे हैं। या तो युवा उस लायक ही नहीं कि रोज़गार मिल सके या फिर ये अवसर मृग मारीचिका हैं। दरअसल, रोज़गार के वादों के कारण युवाओं का बड़ा मोह जुड़ा था मोदी सरकार से लेकिन रोज़गार के क्षेत्र में नाकामी के कारण लोगों का मोहभंग हो रहा है।

ख़ैर सरकार के दावों में गड़बड़झाला बहुत है। मेक इन इंडिया के बारे में अब बातें नहीं होती। स्टार्ट अप इंडिया भी चर्चाओं में कम ही रह पाता है। नमामि गंगे अभियान उपलब्धियों की सूची में जगह नहीं बना पाती है। गौरतलब है कि ये अति महत्वाकांक्षी योजनाएँ थी। जो बुरी तरह से फ्लॉप रही हैं।

मोदी सरकार की अधिकतर योजनाएँ पीआर एक्सरसाइज़ बन कर रह गई हैं। इन पर पैसा पानी की तरह बहाया गया है। लेकिन ज़मीनी स्तर पर बहुत बड़ा लाभ होता नहीं दिखा है। मन की बात जिसके ज़रिए पीएम मोदी सरकार के कामों का प्रचार संवाद रूप में जनता से करते हैं के विज्ञापन पर 8.5 करोड़ रुपया खर्च किया जा चुका है।

क्या करदाताओं का पैसा सरकार की ब्रांडिंग और एडवरटाइजिंग मात्र के लिए होता है। क्या सरकार द्वारा इतनी बड़ी राशि का उपयोग अपनी ब्रांडिंग के लिए करना जायज़ है। ये सवाल और भी प्रसंगिक तब हो जाते हैं जब मीडिया का एक बड़ा हिस्सा पेड न्यूज़ के आरोपों को झेल रहा है।

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