पत्रकारों के बहाने आपके लोकतंत्र की हत्या
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पत्रकारों के बहाने आपके लोकतंत्र की हत्या

Author: Adarsh Kumar   04 May 2018

पत्रकारों के बहाने आपके लोकतंत्र की हत्या

लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाने वाला मीडिया हमेशा से ही सत्ता और शोहरत दोनों की नज़रों मे खलता रहा है। सत्ता हमेशा ही मीडिया को काबू मे रखना चाहती है, और शोहरत चाहती है कि मीडिया यदि रहे तो केवल और केवल प्रशंसा करे। पर वर्तमान में हालत इतनी बदतर हो गई है कि सच्ची पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों का जीना दूभर हो गया है। पिछले कुछ वर्षों कि खबरों पर यदि नजर डालें तो यह बात सामने आती है कि जो भी पत्रकार सच बोलने या लिखने कि हिम्मत कर रहे हैं उन्हें जान से मार दिया जा रहा है या लगातार जान से मारने समेत तमाम तरह कि धमकीयां देकर डराया जा रहा है। समाज मे फैल रही असहिष्णु ताकतें आलोचना बर्दाश नही कर पा रही है और अपने खिलाफ उठ रही सभी आवाजों को मिटा देना चाहती है।

विश्व इतिहास पर यदि गौर करें तो यह पता चलता है कि जिस देश ने भी मीडिया को दबाया है वहां तानाशाही ताकतों का उदय हुआ है। और जिस रफ्तार से भारत में मीडिया का गला घोंटा जा रहा है वो दिन दूर नही की जब हम पूरी तरह से एक तानाशाही ताकत के अधीन हो जाएंगे। इस दौर मे अपनी सुरक्षा को ध्यान मे रखते हुए बहुत से मीडिया घराने अब महज विज्ञापन केंद्र बन कर रह गए हैं। क्योंकि उन्हें मालूम है सत्ता के खिलाफ बोलेंगे तो मारे जाएंगे। सत्ता के अलावा जो लोग पुंजीपति है या सेलीब्रिटी (जाहिर है पैसे वाले होंगे) है वो लोग भी मीडिया को हमेशा उसी नजर से देखते रहे है जिस नजर से सत्ता देखती है।  

भारत में 1992 से आज तक 42 से ज्यादा उन पत्रकारों की हत्या हो चुकी है जो समकालीन दौर में सर्वश्रेष्ठ स्तर पर रहे हैं। इसके अलावा सैकड़ों समान्य पत्रकार हर दशक में मारे जाते रहे है। राजनैतिक दबावों के कारण उनकी रिपोर्टिग नहीं होती है, अगर थोड़ी बहुत रिपोर्टिग हो भी गई तो आरोपियों पर कोई कारवाई नहीं होती है। इसका मूल वजह यह है की ज्यादतर पत्रकारों कि हत्या के आरोपी राजनेता रहे हैं। लगभग हर एक हत्या के बाद की एक ही कहानी है, “जाँच”! 

इन पत्रकारों की हत्या ज्यादा डरावनी नही है, अगर ज्यादा डरावनी कुछ है तो वह है हमारी चुप्पी (जनता की चुप्पी)। क्योकि किसी भी पत्रकार का मरना केवल उसका मरना नहीं है। उसके मरने के साथ जनता की आवाज भी मरती है। rsf.org के अनुसार विश्व के लगभग सभी बड़े देशो को मिलाकर देखें तो पिछले 15 सालों मे लगभग 1035 सें ज्यादा प्रोफेशनल पत्रकार मारे जा चुके हैं। जिसमे 4% से ज्यादा भारत से हैं। अगर आपको ये आकड़ा  (4%) कम लगता हो तो ये सोचना न भूलिएगा की विश्व स्तर पर जहा बहुत से देश आज भी पूर्ण तानाशाही और राजतंत्र आदि व्यवस्थाओं में जी रहे है, और भारत लोकतंत्र मे जी रहा है। इसलिए 4% का आंकड़ा एक बड़े खतरे की घंटी है। भारत हीं नहीं लगभग पूरे विश्व में ज्यादतर पत्रकारों कि हत्या सत्ताधारी लोगों द्वारा कराने की बात सामने आई है। हर देश में ऐसी हत्याओं के विरोध में तमाम तरह के आंदोलन होते रहे हैं। भारत में भी कई बार पत्रकारों के मारे जाने पर बहुत से पत्रकारों ने पद यात्रा, कैडल मार्च, PCI में सभा इत्यादि करते रहे हैं। इनसब मे एक बात जो सामने आती है कि पत्रकारों की हत्या पर जनता की ओर से विरोध प्रदर्शन की खबरें बहुत कम देखने को मिलती हैं।

एम. एम. कलबुर्गी, गौरी लंकेश जैसे कई पत्रकारों की कहानियां हमारे सामने है। ये उन पत्रकारों में से है जो सत्ता की मजबूत आलोचना करने की क्षमता रखते थे। और इनकी हत्या पर सत्ता पक्ष पर सीधे-सीधे आरोप भी लगे है। बिहार मे पिछले महीने दो पत्रकारों को गाड़ी से कुचल कर मार दिया गया। आए दिन भारत के लगभग सभी राज्यों से पत्रकारों के मरने की ख़बरें आती रहती हैं।  गौरी लंकेश की हत्या पर तमाम भाजपा नेता प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर  ख़ुशियाँ मना रहे थे। देश के प्रधानमंत्री ऐसे लोगों को ट्विटर पर फौलो करते है जिसने गौरी की हत्या पर अपने ट्विटर पर गाली लिखा था। ऐसे मे सवाल गहरा होता जाता है कि क्या सचमुच जनता को पत्रकारों से कोई मतलब नहीं है। अगर मतलब है तो कोई आवाज़ क्यो नहीं उठाता? लोग पत्रकारों का साथ क्यों नही दे रहे है? पत्रकारिता का खतरे में पड़ना समाज का खतरे में पड़ना है। एक ऐसे समाज की कल्पना बहुत डरावनी है जिसमे सूचना के आदान प्रदान के लिए कोई ईमानदार माध्यम नही बचे।

By: Adarsh Kumar
adarsh@molitics.in

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