भारतीयता मर रही है और हम बिलबिला रहे हैं
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भारतीयता मर रही है और हम बिलबिला रहे हैं

Author: Neeraj Jha calender  31 Jul 2017

भारतीयता मर रही है और हम बिलबिला रहे हैं

कर्नाटक की एक वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश मार दी गईं। कारण - उनका सवाल उठाना। नए नए पैदा हुए देशभक्तों के लिए आदर्श पुरुष (कम से कम वो बोलते तो ऐसा ही हैं) भगत सिंह कहा करते थे - कि किसी भी बात को तब तक मान्यता नहीं दी जानी चाहिए जब तक उस खुद परख न लिया जाए। भगत सिंह कहते थे - तर्क की कसौटी पर कसे बिना किसी भी बात को मान लेने से हम एक कमज़ोर समाज का निर्माण करेंगे। और एक कमज़ोर समाज न तो अपनी रक्षा कर पाएगा और न ही देश की। लेकिन भगत सिंग की तस्वीर वाली टीशर्ट पहनने वाले और सिरों पर भगवा लपेटने वाले आज के नए देशभक्त न तो भगत सिंह के दर्शन को समझते हैं और न ही भारतीयता को। हत्या केवल गौरी लंकेश की हुई है लेकिन मारा बहुत से लोगों को गया है। गोली किसी एक ने ही चलाई होगी लेकिन हत्यारे अनेक हैं। बेंगलुरु की ये दुर्घटना भविष्य के वे पदचाप हैं जो अत्यंत भयावह और क्रूर हैं। गौरी लंकेश की हत्या के बाद प्रधानमंत्री और कैबिनेट मंत्रियों द्वारा फॉलो किए जाने वाले लोग और दुर्भाग्यपूर्ण रूप से गणेश शंकर विद्यार्थी जी की बिरादरी से आने वाले कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर जो कुछ भी लिखा वो इंसानी दुर्बलता का चरम है। यहाँ दुर्बलता के चरम से मेरा आशय उस भयावह स्थिति से है जिसके कारण लोगों की सोचने समझने और तर्क करने की शक्ति क्षीण पड़ जाती है। चरम दुर्बलता वह स्थिति है जब लोग किसी शक्तिशाली दिख रहे समूह या व्यक्ति के गुणगान में इस क़दर लिप्त हो जाएँ कि निजी विचारों और मन के सहज सवालों को चेहरा उठाने का भी मौक़ा न मिले। आज व्यक्तिवाद की समस्या से ग्रसित हमारे समाज में दुर्बलता का यह चरम बड़े साधारण तरीके से दिख जाता है। हत्या हुई, ये किसी से छिपी नहीं लेकिन लोग हत्या का विरोध नहीं कर पा रहे। उल्टे, हत्या की ख़ुशियाँ मनाई जा रही है। हत्या के बाद लोगों का एक ख़ास वर्ग इस तरह से ख़ुशियाँ मना रहा है जैसे कोई जंग जीत ली हो। कहाँ खो गई हैं हमारी संवेदनाएँ? ख़ैर गौरी लंकेश जी के आख़िरी संपादकीय में जिस तरह से फ़ेक न्यूज़ को लेकर मोदी समर्थकों को लताड़ा गया था वो दिखाता है कि कौन लोग उनसे सबसे ज़्यादा चिढ़े होंगे। ये भी संभव है कि कर्नाटक की कांग्रेस सरकार राजनैतिक फ़ायदे के लिए तुच्छतम राजनीति कर गई हो। संभावनाएँ हैं, जो जाँच होने पर ही सिद्ध हो पाएंगी। लेकिन मौत के बाद जिस तरह से हिंदु राष्ट्रवादियों के कमेंट्स आए वो क़ाबिल-ए-गौर है। प्रधानमंत्री द्वारा फॉलो किए जाने वाले नितिन दधीच लिखते हैं "एक कुत्तिया की मौत पर सारे पिल्ले बिलबिला रहे हैं"। ना! ना! देश में असहिष्णुता बिल्कुल भी नहीं बढ़ी और ना ही संप्रदायिकता ने रफ्तार पकड़ी है। ना तो हमारे विचारों पर पाबंदी लगाई जा रही है ना ही हमारे सोचने को रेग्युलेट किया जा रहा है। गौरी लंकेश की हत्या न तो लोकतंत्र के लिए एक सवाल है न हीं सरकार के लिए जिम्मेदारी। ना तो समाज के लिए एक सबक नहीं मीडिया के लिए एक चेतावनी। सच बयान करने के लिए कहा किसने है आपको? राजेश रेड्डी साहब का एक शेर है- "सर कलम होंगे कल यहाँ उनके जिनके मुँह में ज़बान बाकी है" एक दल है जिसे जनता ने सर्वोच्च आसन दिया मतों के सहारे। अब जब तक उस दल का शासन है उस को पसंद आने वाली बात कर लीजिए, दिमाग पर ताला लगाइए और जुबान पर लगाम। यही वक्त की मांग है। वगरना कहलाइए 'सेकुलर कुत्ते', पाकिस्तानी, देशद्रोही, गद्दार और अगर इन सब चीजों से फर्क नहीं पड़ता तो मर जाइए इन लोगों द्वारा दी गई मौत से। ख़ैर नितिन दधीच को बताना चाहता हूँ कि मौत कुत्तिया की नहीं हुई है भाई। मौत तो भारतीयता की हो रही है दिन ब दिन और रोने वाले भारतीयता के पोषक हैं। आप कुछ भी कहो।

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