सिस्टम की उदासीनता कुचल रही बच्चों के सपने
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सिस्टम की उदासीनता कुचल रही बच्चों के सपने

Author: calender  06 Sep 2017

सिस्टम की उदासीनता कुचल रही बच्चों के सपने

तमिलनाडु की अनिता को सिस्टम की उदासीनता ने मारा है। सिर्फ अनीता को नहीं बल्कि गुजराती,बांग्ला,मराठी,अहोमिया,तेलुगु भाषाओं की हज़ारों अनिताओं के सपने कुचल दिए गए हैं। मई और जून के प्रादेशिक अख़बार उठाकर देखिये, NEET (NATIONAL ELIGIBILITY CUM ENTRANCE TEST) मेडिकल परीक्षा देने वाले छात्रों के प्रदर्शन की ख़बरों से भरे हैं। इन छात्रों की मांग थी कि उनकी भाषा के सवाल अंग्रेज़ी के सवाल से भी मुश्किल थे और हर भाषा के लिए अलग प्रश्न पत्र था। जब पूरे देश में एक परीक्षा हो रही है तो प्रश्नों का स्तर भी सभी भाषाओं में एक होना चाहिए। क्या यह ग़लत मांग थी? मगर हुआ क्या, किसी ने ध्यान नहीं दिया। भाषा के नाम पर बस ट्रक जला देंगे, शपथ लेकर नौटंकी कर देंगे मगर भाषाई छात्रों ने इंसाफ़ मांगा तो सिस्टम को फर्क नहीं पड़ा। कई राज्यों ने केंद्र सरकार को लिखा कि इस पर ध्यान दीजिए। कुछ नहीं हुआ तो कई लोग अदालत गए। केंद्र सरकार राज्यों की मांग को गंभीरता से नहीं ले सकी। उसे अंत अंत तक लगता रहा कि अलग अलग भाषा के अलग अलग प्रश्न पत्रों से कोई फर्क नहीं पड़ता है। जब व्यापम मामले के समय से मेडिकल परीक्षा के लिए लड़ने वाले आनंद राय की याचिका पर सीबीएसई ने कुछ आंकड़े दिए तो पोल खुल गया। अगर ये आंकड़े हैं तो हम सभी को शर्म आनी चाहिए। पूछना चाहिए कि इस देश में भाषाई छात्रों के भविष्य का कोई माई बाप है या नहीं। उनके एक साल से क्यों खिलवाड़ किया गया? नीट की परीक्षा 720 अंकों की होती है। सी बी एस ई ने जो आंकड़े पेश किए उसके अनुसार 600 से अधिक अंक हासिल करने वाले छात्रों में से सिर्फ एक छात्र भाषाई माध्यम का था। 3000 छात्र अंग्रेज़ी माध्यम के थे। 500 से 600 अंक लाने वाले छात्रों में 84 छात्र भाषाई माध्यम के थे और 23,000 छात्र अंग्रेज़ी माध्यम के। सोचिए 500 से ऊपर जिन छात्रों ने क्लालिफाई किया है उसमें अंग्रेज़ी माध्यम के 26,000 छात्र हैं और भाषाई माध्यम के मात्र 85। यह मज़ाक नहीं है तो क्या है। मैं नहीं मानता कि उड़ीया, बांग्ला, तमिल या तेलुगू या गुजराती का कोई छात्र अंग्रेज़ी माध्यम से कम होते हैं। इन्हें सिस्टम ने बाहर किया है। राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा का यह हाल था कि तेलंगाना के ढाई सौ छात्रों को अंग्रेज़ी का प्रश्न पत्र दे दिया गया जबकि उन्होंने तेलुगू माध्यम से परीक्षा देने का फार्म भरा था। बाद में उनकी परीक्षा तेलुगू में ली गई। कई राज्यों से प्रश्न पत्र लीक होने की ख़बरें भी आईं। सोचिए, नौजवानों का कितना दिल टूटता होगा। वे डाक्टर बनने जा रहे हैं और सिस्टम मजबूर कर रहा है कि तरह तरह के तरीके अपनाओ, पैसे खर्च करो वर्ना डाक्टर नहीं बनोगे। आज हालत ये हो गई है कि पोस्ट ग्रेजुएट की सीट एक एक दो दो करोड़ में बिकने लगी है। दिल्ली एयरपोर्ट में मुरादाबाद के दो लड़कों ने कहा कि हम अभी ही गुलाम हो गए सर, लोगों की सेवा क्या करेंगे। डाक्टर बनने से पहले समझ गए, कि हमें डाकू कौन बनाता है। 17 जुलाई के आसपास कई अखबारों में केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश झावड़ेकर ने कह दिया कि अगले साल से जो प्रश्न पत्र पूछे जाएंगे उनके स्तर सभी भाषाओं में एक समान होंगे। उन्होंने इसकी जवाबदेही नहीं ली कि इस साल क्यों नहीं पूछे गए, और जब यह गड़बड़ी हुई है तो उसका समाधान क्या है। चूंकि ग्रामीण, कस्बाई और भाषाई छात्र थे इसलिए किसी ने परवाह नहीं की, आराम से कह दिया कि अगले साल देख लेना। उनका एक साल जैसे कुछ मायने ही न रखता हो। नीट की कहानी को समझने के लिए पृष्ठभूमि में जाना ज़रूरी है। 2013 में प्रयोग के तौर पर कपिल सिबब्ल ने अखिल भारतीय परीक्षा व्यवस्था के लिए एक प्रयोग किया। आधा अधूरा रह गया, 2014-15 में नीट परीक्षा नहीं हुई। 2016 के साल में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नीट की परीक्षा होगी। छात्रों ने स्वागत किया कि अब जगह जगह काउंसलिंग के लिए भटकना नहीं होगा, फीस नहीं भरनी होगी मगर सिस्टम ने उनका गला घोंटने के दूसरे तरीके निकाल लिए। उस साल सुप्रीम कोर्ट के जिस फैसले को केंद्रीय मंत्री डाक्टर हर्षवर्धन ऐतिहासिक बताते हुए स्वागत कर रहे थे, ट्वीट कर रहे थे, उनकी सरकार उसी फैसले को पलटने के लिए अध्यादेश ला रही थी। नीट की एक परीक्षा हो चुकी थी मगर बाद में तय हुआ कि एक और होगी। ऐसा किसी देश में आज तक हुआ है, आपने सुना है। यही नहीं, पिछले साल उन प्राइवेट मेडिकल कालेज को अपनी परीक्षा आयोजित करने की छूट दे दी गई, जिनके यहां सरकारी कोटा नहीं है। उस वक्त दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कहा था कि प्राइवेट कालेजों को नीट से बाहर मत कीजिए। इससे काला धन वालों के एडमिशन होंगे और साधारण परिवारों के छात्रों के साथ नाइंसाफी होगी। कांग्रेस और एन सी पी ने भी विरोध किया था। मगर, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट और डेंटिस्ट एक्ट का सहारा लेते हुए प्राइवेट मेडिकल कालों को अपनी प्रवेश परीक्षा कराने की अनुमति दे दी। ये तब हुआ जब देश व्यापक जैसे प्राणघातक घोटाले को देख चुका था और पचा चुका था। नीट की व्यवस्था को लेकर इतने विवाद उठे कि इसके निदेशक को हटाना पड़ा है। कई राज्यों में मेडिकल की प्रवेश परीक्षाएं अंग्रेज़ी माध्यम में ही हुआ करती थीं। तय हुआ कि नीट अंग्रेज़ी और हिन्दी में होगी मगर राज्यों के दबाव के आगे इसे सात आठ भाषाओं में कराने का फैसला किया गया। अगले साल से उर्दू में भी प्रश्न पूछे जाएंगे। यह बहुत अच्छा कदम था। इससे भाषाई छात्रों को डाक्टर बनने का सपना दिखन लगा मगर अलग अलग ही नहीं, मुश्किल सवाल पूछकर उनके सपने पर पहले ही साल हमला कर दिया गया। आनंद राय कहते हैं कि ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में वही डाक्टर जाते हैं जो वहां के होते हैं। इसलिए मेडिकल सिस्टम में जब तक इन इलाकों से ज्यादा संख्या में डाक्टर नहीं आएंगे, यहां डाक्टरों की समस्या दूर नहीं होगी।

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