‘चाणक्य नीति’ जैसा कुछ नहीं, सब मीडिया मैनेजमेंट है
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‘चाणक्य नीति’ जैसा कुछ नहीं, सब मीडिया मैनेजमेंट है

Author: calender  16 Mar 2018

‘चाणक्य नीति’ जैसा कुछ नहीं, सब मीडिया मैनेजमेंट है

जहां भाजपा सफल हो जाती है, वहां ये कथित ‘चाणक्य नीति’ का ढोल पीटते हैं, जहां विफल हो जाते हैं तो कहते हैं कि अति-आत्मविश्वास हमें ले डूबा.

भाजपा उपचुनाव को लेकर बिल्कुल आश्वस्त थी. उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उन्हें इतनी करारी हार मिलेगी. भाजपा ही नहीं विपक्षी दल भी खासकर उत्तर प्रदेश के, वो भी इतने आश्वस्त नहीं थे कि इतनी शानदार जीत होगी. फूलपुर को लेकर जब मैं विपक्ष की बात सुनता था तो उनके कार्यकर्ता वहां दावा करते थे कि हो सकता है कि वे वहां जीत जाएं, लेकिन विपक्ष में तो उनके बड़े नेता और सक्रिय कार्यकर्ता भी इस तरह के दावे नहीं करते थे. वे खामोश ढंग से काम करना चाहते थे क्योंकि वो बहुत कॉन्फिडेंट नहीं थे. ये अद्भुत है कि नेता से ज्यादा अवाम और वहां की सक्रिय जनता ने भाजपा के उम्मीदवारों को हराने में ज्यादा मेहनत की है.

मुझे लगता है कि इसकी वजह को दिल्ली या बाहर बैठे मीडिया के लोग या विश्लेषक और चैनलों पर बैठे टिप्पणीकार समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है. मैं समझता हूं ऐसा इसलिए हुआ है कि उत्तर प्रदेश में जो आम मतदाता हैं, उनमें दो तरह के लोग हैं. एक तो वे जो भाजपा से पूरी तरह मुग्ध हैं कि यही ठीक हैं. समाजशास्त्रीय स्तर पर देखें तो इनमें ऊंची जातियों का एक बड़ा हिस्सा है. सभी ऊंची जातियां नहीं लेकिन इन जातियों का एक बड़ा हिस्सा अभी भी मानता है कि भाजपा उनके लिए बेहतर हैं. व्यापारी वर्ग का एक बहुत छोटा हिस्सा अभी बचा है जो भाजपा के पक्ष में है क्योंकि नोटबंदी और जीएसटी से वो परेशान महसूस करता है. वे राजनीतिक तौर पर तो भाजपा से नाराज हैं लेकिन उनकी नाराजगी वोट में तब्दील नहीं होती. हालांकि यह भी नहीं कह सकते कि व्यापारी समुदाय पूरी तरह भाजपा के पक्ष में है. इसमें भी विभाजन है. लेकिन जो दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक हैं, उनका एक बड़ा हिस्सा, खासकर ओबीसी का एक वर्ग था जो 2014 के आम चुनावों में भाजपा के पक्ष में भी गया था. उत्तर प्रदेश के ग़ैर-यादव वर्ग में कुर्मी और कोईरी दो प्रमुख जातियां हैं, इनमें भाजपा ने ज़बरदस्त सेंध लगाई थी. उसकी मुख्य वजह यह थी कि बसपा और समाजवादी पार्टी (सपा) दोनों के शीर्ष नेतृत्व ने इन दोनों बिरादरियों के कार्यकर्ता, सामाजिक रूप से सक्रिय लोग, उभरते हुए वर्ग चाहे व्यापार में हो, या सेवा में हो आदि को नाराज कर रखा था. उस समय इन दोनों बिरादरियों का बहुत बड़ा हिस्सा भाजपा में चला गया क्योंकि उन्हें लगा कि भाजपा उन्हें समाज में ज्यादा बेहतर हिस्सेदारी देगी.

2014 में भाजपा ग़ैर-यादव ओबीसी में बहुत बड़ा विभाजन करा पाने में सफल रही. इसके बाद उत्तर प्रदेश में जो उसकी चुनावी कामयाबी थी, उसका मूल मंत्र भी यही था. ऊंची जातियों का ध्रुवीकरण भी भाजपा के पक्ष में गया, साथ ही ग़ैर-यादव ओबीसी में बड़े तबके का भाजपा की तरफ जाना, ये उनकी सफलता के दो बड़े कारण थे. अब इस चुनाव में वो तबका, खासकर पिछड़ा वर्ग का बीते 4 साल से मोदी सरकार को देख रहा है. दलित तो पहले से ही कई कारणों से भाजपा से नाराज हैं. मोदी और उनकी पार्टी के लोग यह दावा करते हैं कि दलितों में भी उन्होंने विभाजन करा दिया है लेकिन मैं नहीं समझता कि दलितों में वैसा विभाजन कराने में उन्हें वैसी कामयाबी मिली है, जैसी ओबीसी में मिली. दलित विपक्ष के साथ जुड़ा था, लेकिन ओबीसी काफी हद तक छिटक गया था. इस चुनाव में उसे लगा कि 4 साल से मोदी की सरकार चल रही थी, इसमें उसे न न्याय मिल रहा है, न तो उसको हिस्सेदारी मिल रही है. न्याय और हिस्सेदारी न मिलने के इन दोनों पहलुओं की वजह से नाराजगी इकठ्ठा होती रही. इन आबादियों के जो युवा ने अपने परिवारों, अपनी आबादियों को मोबिलाइज़ किया कि अब इनके खिलाफ जाना चाहिए.

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