कर्ज और बीमा तले कृषि और किसान
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कर्ज और बीमा तले कृषि और किसान

Author: Adarsh Kumar   27 Feb 2018

कर्ज और बीमा तले कृषि और किसान

बचपन में भारत पर लिखे जाने वाले लेखों को याद कीजिए, जिसमें पहली लाइन अक्सर यही होती है की "भारत एक कृषि प्रधान देश है"। और इसके बाद भारत का दर्शन किजिए। आपको पता लग जाएगा की भारत के किसान को अछूत बना दिया गया है।

अगर ध्यान से देखा जाए तो वर्तमान में एक नई वर्ण व्यवस्था दिखाई देती है। जिसमें ब्राम्हण, वैश्य, क्षत्रीय और शूद्र को नेता, पुंजिपती, धार्मिक ठेकेदार और मध्यमवर्गीय नागरिक के समानांतर देखा जा सकता है। और अगर डॉ आंबेडकर के नजर को अपनाया जाए तो किसान उस शूद्र के समान है जिसे इन चारों वर्णो में से किसी में स्थान नहीं दिया गया है। और कृषि मैला उठाने के काम कि तरह। जिसे करने वाले को इंसान का दर्जा नहीं दिया गया है।

कृषि को नजरंदाज करने से हम किस दिशा में अग्रसर हो रहे हैं, यह बात समझनी बहुत जरूरी है। एक समय में भारत की 70% से ज्यादा आबादी कृषि पर निर्भर करती थी। और आज वह संख्या 50% के करीब आ चुकी है। यह प्रतिशत अच्छा है या बुरा यह भी समझना बहुत जरूरी है। आदि काल से ही कृषि भारत की मुख्य आर्थिक आधार रही है। तो यह बात तो स्वीकार करना होगा की हमने अन्य आर्थिक आधारो पर ज्यादा ध्यान देने के चक्कर में कृषि को दरकिनार किया है। तभी यह प्रतिशत कम हुई है। यह एक सवाल उठता है, हमने जिन दुसरे क्षेत्रों को आर्थिक आधार बनाना शुरू किया वह हमें महज मजदूर बना रही है या स्वामी? क्योंकि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था कि मजबूती तभी सुनिश्चित हो सकती है जब वहां की अर्थजगत का स्वामित्व वहां के सरकार या नागरिकों के पास हो। हिंदुस्तान में कृषि एक मुख्य आर्थिक आधार तो है पर पिछले 50 सालों में लगभग सभी सरकारों ने अपने इच्छा अनुसार इसे बर्बाद किया है और अपने राजनैतिक हित साधे हैं। 2014 तक BJP कांग्रेस को आरोपित करती रहती थी। और किसानों के बदहाली के लिए जिम्मेदार बताया करती थी। 2014 लोक सभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने किसानों के तरक्की के लिए ढ़ेर सारे वादे किए। जैसे फसल कीमत के लिए स्वामीनाथन आयोग लाने की बात, विशेष कृषि प्रणाली स्थापित करना, कर्ज माफी, भुमि शोधन इत्यादि। पर मोदी जी के अबतक के कार्यकाल को ध्यान से देखा जाए तो सभी कृषि  योजनाओं पर राजनिति की मोहर दिखती है। सरकार ने सभी मामलों को कर्ज माफी और बीमा पर लाकर पटक रखा है। बहुत से ऐसे जरूरी मुद्दे हैं जिन पर तो बात भी नहीं होती। जैसे किटनाशक से होने वाले मौंत, भुखण्ड के प्रर्विती में परिवर्तन, किसानों के स्वास्थ तथा किसानों के शिक्षा स्तर इत्यादि। कुछ मुद्दों पर थोड़ी बहुत बात होती तो है जैसे फसल कीमत, कृषि व्यवस्था या कृषि यंत्रों की आधुनिकीकरण इत्यादि। पर ऐसे मुद्दों को सरकार और मिडिया दोनों ही अनसुना कर देती है।

आज भारत के किसान का प्रतीमाह आय 2000 से भी कम है। The Indian Express में अक्टुबर 2017 में छपे एक रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र के यावतमाला अस्पताल में किटनासक के वजह से लगभग 50 से ज्यादा किसानों की मौत, 800 से ज्यादा किसान बीमार तथा कई किसानों की आंखे जाने की खबर सामने आई।

समझना होगा, किसानों की समस्याओं का मूल वजह क्या है? कृषि हमारे लिए आवश्यक क्यो है? तथा सबसे जरूरी, किसानों की मूल समस्याएं क्या है? सरकारों ने अपने फायदे के लिए कृषि भूमि को बेचा जिससे किसान भूमिहीन होते गए। उसके तर्क में कई लोग तकनीकीकरण इत्यादि का हवाला दे सकते हैं। पर इसके तकनिकीकरण के चक्कर में कोई ऐसा उपाय नहीं किया गया जिससे भुमिहीनता जैसी समस्या को रोका जा सके। कृषि की आवश्यकता के लिए केवल यह कहना कफी नहीं है की इससे खाने को अन्न मिलता है। कृषि भारत के 50% से ज्यादा लोगों के जिने का आधार है। पर एक तरफ तो पुंजिपती हजारों करोड़ लूट बैक-टू-बैक सफलता पुर्वक फरार हो रहे हैं और सरकार उन्हें शय दे रही है। तो दुसरी ओर किसानों को महज 90000 हजार ट्रैक्टर लोन के लिए उसी ट्रैक्टर के नीचे कूचल कर और अपनी मांगों के लिए आंदोलन कर रहे किसानों पर गोलियां चला कर मार दिया जाता है।

मोदी सरकार ने अबतक के अपने सभी बजट में कर्ज माफी और बीमा को भीख के तरह प्रस्तुत किया है। जिससे ज्यादातर राज्यों में किसानों का मजाक बनाया गया है। उत्तर प्रदेश के योगी सरकार ने अपने मनोनीत तरीके से कर्ज माफी की ऐसी योजना पेश किया जिसमें एक तिहाई के लगभग किसानों के 80 पैसे, 1 रुपए, 500 रुपए, 1000 रुपए माफ हुए। मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री रहते हुए वर्तमान उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू ने बयान दिया था कि किसानों ने कर्ज माफी को फैसन बना लिया है।

बहरहाल ये बात साफ है कि किसानों की समस्याओं को दूर करने के लिए कर्ज माफी का ढ़ोल और बीमा का पेटारा एक मुकम्मल उपाय नहीं है। मशहूर किसान नेता और स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव के एक रिपोर्ट के अनुसार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना एक धांधली का अड्डा बन चुका है। जिसमें वीतीय वर्ष 2016-2017 के तहत 25% से भी कम किसान कवर हुए। और उसके 12% को बड़ी मुश्किल से रिटर्न मिल पाया। सवाल यह भी है, क्या यह रिटर्न 100% को भी मिल जाता तो यह एक मुकम्मल उपाय हो पाता? नहीं!

राष्ट्रवाद के नाम पर धर्म के संस्थाओं को सहयोग दे रहे नागरिकों को समझना होगा की कृषि समाज के हर तबके से जुड़ा है। चाहे वो दलित हो, पिछड़ा हो या समान्य वर्ग। होनहार युवाओं एक ऐसा राष्ट्रवाद बनाओ जो किसानों के लिए हो। जिससे तुम फक्र से कह सको की "मैं किसान का बेटा हूं"। ताकि तुम्हारे पिता तुम्हारी पढ़ाई का खर्च दे सके। बहन की शादी और अन्य खर्चे के लिए रुपए जुटा सके। 

साथ ही समाधान के लिए किसानों को मजबूती से एक साथ आना होगा। अपनी मांगे और स्पष्ट करनी होगी। अपनी मांगों को मनवाने के लिए सरकार को मजबूर करना होगा। कहना होगा की एक बार पूरे देश के किसानों का कर्ज माफ हो ( जो राशि माल्या और नीरव द्वारा चुराए गए पैसे से बहुत कम है)। साथ ही फसल कीमत के लिए स्वामीनाथन आयोग को लागू किया जाए। सुखा, बाढ़, कृषि यंत्र, उर्वरक, मंडी, गोदाम इत्यादि के लिए अत्याधुनिक मापदंड स्थापित हो। वर्ना आर्थिक आधार बदलने के शौक में कृषि को नजरंदाज करने की आदत। जो हमें मानसिक तौर पर विकलांग कर चुकी हैं। वो जल्दी ही आर्थिक तौर पर भी पूरी तरह से विकलांग कर देगी।

By: Adarsh Kumar
adarsh@molitics.in

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