दास्तान-ए-कश्मीर
Latest Article

दास्तान-ए-कश्मीर

Author: calender  15 Jun 2018

दास्तान-ए-कश्मीर

धोके का दिन है 19 जनवरी। तमाम मजबूरियों और दर्द का दिन, जब आपके अपनो ने आपको अपने घरों से दूर जाने को मजबूर किया। सरकार आपका साथ नहीं देती और आपके दर्द को भुला भी देती है। कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार को सेक्युलर रहने और देश में समरसता लाने के नाम पर बहा दिया गया है। ये भी सच है कि कश्मीरी पंडित सहित माइनॉरिटीज़ के साथ हर बार खराब व्यवहार हीं हुआ है। जिससे यह साबित होता की हमारा सिस्टम खुद से ही डरता है। जैसे हमे यकीन है कि हम लोग अपने लोगों को बचा नहीं पाएंगे शायद इसलिए हम ये भी मानने से डरते हैं कि कश्मीरी पंडितों के साथ बुरा हुआ है। पर क्या ये तरीका सही है? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम सबको न्याय दिला पाएं? न्याय के क्रम में ये कहां से आ जाएगा कि जो ‘बहुसंख्यक’ है वो पीड़ित नहीं हो सकता और ‘अल्पसंख्यक’ गलत नहीं हो सकता? फिर ऐसा तो नहीं है कि इन दोनों वर्गों के लोग आपस में एक-दूसरे से बहुत जुड़े हुए हैं। अगर ऐसा होता तो ये अपना दुख आपस में बांट ही लेते। बात ही खत्म हो जाती। क्या हम ऐसा नहीं कर सकते कि लोगों को बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के चश्मे से देखना छोड़कर उनके लोकल व अपने मुद्दों को देखना शुरू करें? 19 जनवरी 1990 को वो दिन माना जाता है जब कश्मीरी पंडितों को अपना घर छोड़ना पड़ा था। कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तो जंग 1947 से ही जारी है। पर कश्मीर में लोकल स्थिति इतनी खराब नहीं थी। कश्मीरी मुसलमानों और कश्मीरी पंडितों के प्यार की तमाम कहानियां हैं। 1980 के बाद माहौल बदलने लगा था, जब रूस अफगानिस्तान पर चढ़ाई कर चुका था, और अमेरिका उसे वहां से निकालने की फिराक में था। लिहाजा अफगानिस्तान के लोगों को मुजाहिदीन बनाया जाने लगा। ये लोग बगैर जान की परवाह किये रूस के सैनिकों को मारना चाहते थे। इसमें सबसे पहले वो लोग शामिल हुए जो अफगानिस्तान की जनता के लिए पहले से ही समस्या थे। क्रूर, वहशी, उठाईगीर और अपराधी लोग। इन सबकी ट्रेनिंग पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में होने लगी। और आस-पास के लोगों से इनका सम्पर्क होना शुरू हुआ। जब ऐसे लोगों पर पुलिस ने कार्रवाई की तो उसकी जद में बाकी मुसलमान भी आए और कई जगहों पर बेकसूर लोग भी फंस गये। 1986 में गुलाम मोहम्मद शाह ने अपने बहनोई फारुख अब्दुल्ला से सत्ता छीन ली और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बन गये। खुद को सही ठहराने के लिए उन्होंने एक खतरनाक ऐलान किया कि जम्मू के न्यू सिविल सेक्रेटेरिएट एरिया में एक पुराने मंदिर को गिराकर भव्य शाही मस्जिद बनवाई जिससे लोगों ने प्रदर्शन भी किया। कट्टरपंथियों ने नारा दे दिया कि इस्लाम खतरे में है। जिसके बाद कश्मीरी पंडितों पर धावा बोल दिया गया। साउथ कश्मीर और सोपोर में सबसे ज्यादा हमले हुए। जोर इस बात पर रहता था कि प्रॉपर्टी लूट ली जाए। हत्यायें और रेप तो बाई-प्रोडक्ट के रूप में की जाती थीं। नतीजन 12 मार्च 1986 को राज्यपाल जगमोहन ने शाह की सरकार को दंगे न रोक पाने की नाकामी के चलते बर्खास्त कर दिया। 1987 में चुनाव हुए जिसमे कट्टरपंथी हार गये। जब बहुत कुछ ठीक किया जा सकता था। क्योंकि चुनाव में कट्टरपंथ का हारना इस बात का सबूत है कि जनता अभी भी शांति चाहती थी। पर कट्टरपंथियों ने चुनाव में धांधली का आरोप लगाया। हर बात को इसी से जोड़ दिया कि इस्लाम खतरे में है। जुलाई 1988 में कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए लिबरेशन फ्रंट बना। कश्मीरियत अब सिर्फ मुसलमानों की रह गई और पंडितों की कश्मीरियत को भुला दिया गया। 14 सितंबर 1989 को भाजपा के नेता पंडित टीका लाल टपलू को कई लोगों के सामने मार दिया गया और हत्यारे पकड़ में भी नहीं आए। ये कश्मीरी पंडितों को वहां से भगाने को लेकर पहली हत्या थी। 4 जनवरी 1990 को उर्दू अखबार आफताब में हिज्बुल मुजाहिदीन ने छपवाया कि सारे पंडित कश्मीर की घाटी छोड़ दें। अखबार अल-सफा ने जिसे दोबारा छापा। चौराहों और मस्जिदों में लाउडस्पीकर लगाकर कहा जाने लगा कि पंडित यहां से चले जाएं, नहीं तो बुरा होगा। इसके बाद लोग लगातार हत्यायें औऱ रेप करने लगे। कहते कि पंडितो, यहां से भाग जाओ, पर अपनी औरतों को यहीं छोड़ जाओ – असि गछि पाकिस्तान, बटव रोअस त बटनेव सान (हमें पाकिस्तान चाहिए। पंडितों के बगैर, पर उनकी औरतों के साथ।) गिरजा टिक्कू का गैंगरेप हुआ और फिर मार दिया गया। ऐसी ही अनेक घटनाएं हुईं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 60 हजार परिवार कश्मीर छोड़कर आस-पास के राज्यों में भाग गये। 19 जनवरी 1990 को सबसे ज्यादा लगभग 4 लाख लोगों ने कश्मीर छोड़ा था। हालांकि आंकड़ों के मुताबिक अभी लगभग 20 हजार पंडित कश्मीर में रहते हैं। विस्थापित परिवारों के लिए तमाम राज्य सरकारें और केंद्र सरकार तरह-तरह के पैकेज निकालती रहती हैं। कभी घर देने की बात करते हैं तो कभी पैसा। पर इन 27 सालों में मात्र एक परिवार वापस लौटा है। क्योंकि 1990 के बाद भी कुछ लोगों ने वहां रुकने का फैसला किया था। पर 1997, 1998 और 2003 में फिर नरसंहार हुए थे। हालांकि नरेंद्र मोदी की सरकार ने 2015 में कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास के लिए 2 हजार करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की थी। पर इतने लोगों का इससे क्या ही होगा। ये सारी बातें किसी धर्म के दूसरे धर्म के प्रति नफरत को नहीं दिखाती हैं। ये बातें है किसी भी मैजॉरिटी की, जो कि कंट्रोल खो देने पर माइनॉरिटी के लिए कहर बन जाती हैं। अगर ध्यान से देखें तो इन मामलों को तुरंत ठीक किया जा सकता है। अगर सरकार सही और सुलझे दिमाग के साथ एक्टिव हो जाए, तो उग्रवाद की समस्या को दूर किया जा सकता है।

MOLITICS SURVEY

क्या करतारपुर कॉरिडोर खोलना हो सकता है ISI का एजेंडा ?

हाँ
  46.67%
नहीं
  40%
पता नहीं
  13.33%

TOTAL RESPONSES : 15

Caricatures
See more 
Political-Cartoon,Funny Political Cartoon
Political-Cartoon,Funny Political Cartoon

Suffering From Problem In Your Area ? Now Its Time To Raise Your Voice And Make Everyone Know