हादसों का सिलसिला
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हादसों का सिलसिला

Author: calender  22 Aug 2017

हादसों का सिलसिला

त्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर में खतौली के निकट उत्कल एक्सप्रेस जिस तरह दुर्घटनाग्रस्त हुई और उसके चलते तीस यात्रियों की जान गई और सौ से अधिक घायल हुए वह पहली नजर में रेलवे की लापरवाही का नतीजा जान पड़ता है। उत्कल एक्सप्रेस दुर्घटना का शिकार बनी, क्योंकि वह जिन पटरियों पर गुजर रही थी उन पर मरम्मत का काम चल रहा था, लेकिन इसकी सूचना ट्रेन के ड्राइवर के पास नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार से चलती रही और दुर्घटना का शिकार हो गई। यह स्थिति और कुछ नहीं, यही बताती है कि रेलवे विभाग के दायें हाथ को नहीं पता कि उसका बायां हाथ क्या कर रहा है? जिन पटरियों की मरम्मत हो रही है उन पर किसी भी ट्रेन को पूरी गति से गुजारना दुर्घटना को निमंत्रण देने के अलावा और कुछ नहीं। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने जवाबदेही तय करने की बात कही है और सात लोगों को निलंबित कर दिया है, लेकिन आखिर अभी तक ऐसी व्यवस्था का निर्माण क्यों नहीं किया जा सका जिससे उस तरह की गफलत किसी भी कीमत पर न होने पाए जैसी खतौली में हुई। यदि ऐसी किसी व्यवस्था का निर्माण हो गया होता कि मरम्मत वाली पटरियों से गुजरने वाली ट्रेन के ड्राइवरों को इस आशय की सूचना दी जाएगी और उसकी पुष्टि भी की जाएगी तो इतने लोगों को हताहत होने से बचाया जा सकता था। यह ठीक नहीं कि रेलें बार-बार उन्हीं कारणों से दुर्घटना का शिकार होती रहें जिन कारणों से वे पहले भी हो चुकी हैं। रेल मंत्रालय के लिए यह गंभीर चिंता का विषय बनना चाहिए कि ट्रेन दुर्घटनाओं का सिलसिला थमता नहीं दिख रहा है। पिछले तीन वर्षों में करीब तीस ट्रेनें दुर्घटना का शिकार हो चुकी हैं और इसके चलते ढाई सौ से अधिक रेल यात्रियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। यह आंकड़ा भारत में रेल यात्रा के जोखिम भरे होने की ही गवाही देता है। ऐसे आंकड़ों के संदर्भ में ऐसी कोई दलील देना स्वीकार्य नहीं कि इसके पहले भी यात्री ट्रेनें दुर्घटना ग्रस्त होती रही हैं। सुरेश प्रभु के रेलमंत्री बनने के बाद से यह उम्मीद की गई थी कि ट्रेन दुर्घटनाओं का सिलसिला थमेगा, लेकिन ऐसा होता हुआ दिख नहीं रहा है। यह ठीक है कि रेलवे में अन्य अनेक उल्लेखनीय सुधार हो रहे हैं और वे नजर भी आ रहे हैं, लेकिन यदि ट्रेन दुर्घटनाओं के सिलसिले को नहीं रोका जा सका तो ये सुधार अपनी महत्ता खो देंगे। यह समझना कठिन है कि आखिर सुरक्षित रेल यात्रा को सर्वोच्च प्राथमिकता क्यों नहीं दी जा रही है? एक बड़ी संख्या में ट्रेन दुर्घटनाएं इसलिए हो रही हैं, क्योंकि पटरियां या तो पुरानी पड़ चुकी हैं या फिर जर्जर हो चुकी हैं, लेकिन जब रेल यात्रियों की जान जोखिम में हो तब फिर पुरानी पटरियों को ठीक करने अथवा उन्हें बदलने का काम युद्धस्तर पर क्यों नहीं हो सकता और इस दौरान यह क्यों नहीं सुनिश्चित किया जा सकता कि जरूरी सूचना के आदान-प्रदान में कहीं कोई गफलत न हो। यह आवश्यक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य है कि रेल मंत्रालय बिना किसी देरी के जरूरी सबक सीखे।

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